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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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इस कथा के कह लेने के पश्चात् गोमुख के मौन हो जाने पर नरवाहनदत्त के सम्मुख तपनक बोला ॥५५॥

महाराज इन सुभी स्त्रियां का ही विश्वास नहीं प्रत्युत पतिवामी स्त्रियों का भी वेश्याओं के समान विश्वास नहीं करना चाहिए ॥५६॥

चन्द्रश्री और शोभङ्कर वैश्य की कथा

इस सम्बन्ध में मैंने इसी नगर में जो आश्चर्य देखा उसे सुनाता हूँ सुनो। इसी नगरी में बलवर्मा नाम का एक वैश्य था। उसकी भार्या का नाम चन्द्रश्री था। एकबार उस स्त्री ने अपने झरोखे (खिड़की) से शोभङ्कर नाम के एक सुन्दर वैश्यपुत्र को देखा ॥५७-५८॥

तब सहेली के द्वारा उसे सहेली के घर पर ही बुलवाकर कामोन्मत्त उस स्त्री ने छिपकर उसके साथ समागम किया ॥५९॥

जब वह प्रतिदिन उसके साथ चोरी चोरी रमण करने लगी तब घर के सेवकों और उसके भाई-बन्धुओं ने उसे जान लिया ॥६०॥

केवल उसका पति बलवर्मा ही उसके दुराचार को नहीं जान सका। सच है प्रेमान्ध व्यक्ति पत्नी के भी दुराचार को नहीं जान सकता ॥६१॥

कुछ दिनों के उपरान्त उस बलवर्मा को दाहज्वर हुआ और वह वैश्य धीरे-धीरे अन्तिम अवस्था में पहुँच गया ॥६२॥

उसकी उस अवस्था में भी उसकी पत्नी सहेली के घर पर उस प्रेमी के पास जाती रही ॥६३॥

एक दिन इसके वहीं रहते हुए उसका पति मर गया। यह जानकर उसकी स्त्री अपने प्रेमी (जार) से पूछकर तुरन्त आई और पति के शोक में उसकी चिता पर, उसके चरित्र को जानने वाले भाई-बन्धुओ द्वारा रोके जाने पर भी जलकर मर गई ॥६४-६५॥

इस प्रकार, स्त्रियों के चित्त की गति नहीं जानी जा सकती। वह दूसरो से व्यभिचार भी कराती हैं और पति के मरने पर उसके साथ सती भी हो जाती हैं ॥६६॥

तपनक के इस प्रकार कहने पर कमल हरिशिख बोला- 'इसी सम्बन्ध में देवदास का जो वृत्तान्त हुआ उसे सुनो- ॥६७॥ १२