भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... जब वह वंशी रव सुने तब अति व्याकुल होकर भागे उस दशा में उसके सब अंग शिथिल होगये हैं इस से वह गिर-गिर पडती है और फिर उठ कर वेग से दौडती लज्जा से संकोच बन जाती है और भय भी उस को रोक रहा है तब तेरी दशा पूरी सकेगी अथवा नहीं ॥ १- ॥

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