भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक ७५१ इस प्रकार कहकर और उस अश्वरत्न को सोमप्रभ के लिए देकर तथा सोमप्रभ से सत्कृत होकर इन्द्र का सारथी वह मातलि आकाश में उड़कर चला गया ॥६८॥ तब युवराज सोमप्रभ ने उत्सव से मनाकर उस दिन को व्यतीत कर दूसरे दिन अपने पिता से कहा—॥६९॥ 'पिता क्षत्रिय का यह धर्म नहीं है कि वह विजय की इच्छा न करे। इसलिए मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं दिग्विजय करने जाऊँ' ॥७०॥ यह सुनकर प्रसन्न उसके पिता ने 'अच्छा' कहकर उसके दिग्विजय की तैयारी की ॥७१॥ तब युवराज सोमप्रभ माता-पिता को प्रणाम कर, सेनाओं के साथ इन्द्र के उस घोड़े पर चढ़कर शुभ दिन में दिग्विजय के लिए निकल पड़ा ॥७२॥ उस अश्वरत्न से सभी दिशाओं के राजाओं को जीतकर, उस अनन्त शक्तिवाले सोमप्रभ ने उनसे अनेक रत्न प्राप्त किये ॥७३॥ उसने अपने धनुष के साथ शत्रुओं के सिर भी झुका दिये। वह धनुष तो फिर तन गया किन्तु शत्रुओं के सिर फिर न उठ सके ॥७४॥ दिग्विजय करके लौटते हुए युवराज ने मार्ग में हिमालय के समीप सेना का शिविर लगाया और वन में आखेट करना प्रारम्भ किया ॥७५॥ दैवयोग से उसने सुन्दर गन्ध से आकृष्ट एक किन्नर को देखा और उसे पकड़ने के लिए इन्द्र के घोड़े से उसका पीछा किया किन्तु वह किन्नर पर्वत की हिमगुहा में घुसकर अदृश्य हो गया। सोमप्रभ को यह पीछा बहुत दूर ले गया ॥७६-७७॥ सभी दिशाओं को प्रकाशित करके जब प्रचण्डरश्मि भगवान् भास्कर सन्ध्या से संगम करानेवाली पश्चिमा दिशा में पहुँचे तब थके हुए सोमप्रभ ने एक सरोवर को देखा और उसी के किनारे रात बिताने की इच्छा से वह घोड़े से उतर पड़ा ॥७८-७९॥ घोड़े को घास-पानी देकर और स्वयं फल तथा जल ग्रहण कर एक ओर विश्राम करने पर उसने गान का रव सुना ॥८०॥ कौतुकवश गान-ध्वनि के अनुसार कुछ ही दूर जाकर उसने शिवलिंग के आगे गाती हुई एक दिव्य कन्या को देखा ॥८१॥ 'यह आश्चर्यजनक रूपवाली कन्या कौन है? विस्मय के साथ वह यह सोच ही रहा था कि उस कन्या ने भी सोमप्रभ का असाधारण सौन्दर्य देखकर और उसका यथायोग्य सत्कार करके उससे कहा—॥८२॥