कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक ७७७ आपत्ति के समय जिसकी बुद्धि नष्ट नहीं होती वह क्या नहीं कर सकता। इस सम्बन्ध में बगुले को मारनेवाले मकर¹ की कथा सुनो ॥७८॥ बगुला और केकड़े की कथा किसी समय मछलियों से भरे हुए तालाब में एक बगुला रहता था। उसके अंगूठ में ग फैले इसलिए मछलियाँ उसकी आँखों से ओझल रहती थीं ॥७९॥ इस प्रकार, उन मछलियों को न पाकर बगुले ने मछलियों से झूठ कहा कि 'यहाँ पर जाल फेंककर कोई मछली मारनेवाला पुरुष आया है। वह शीघ्र ही तुमलोगों को जाल से पकड़कर मार डालेगा। इसलिए, यदि तुम लोगों को मुझपर विश्वास है तो मेरी बात मानो ॥८०-८१॥ यहाँ पर एकान्त में एक तालाब है जिसे धीवर नहीं जानते। तुमलोग रहने के लिए वहाँ चलो। मैं तुमलोगों को एक-एक करके वहाँ पहुँचा दूँगा ॥८२॥ यह सुनकर उन मूर्ख मछलियों ने डरते हुए उससे कहा—'ऐसा ही करो। हम सब तुम्हारे प्रति विश्वास करते हैं' ॥८३॥ तब वह ठग बगुला उन मछलियों को एक-एक करके ले जाकर एक चट्टान पर पटककर खाने लगा। इस प्रकार, धीरे-धीरे वह बहुत-सी मछलियों को खा गया ॥८४॥ मछलियों को इस प्रकार ले जाते हुए बगुले को देखकर उस तालाब में रहनेवाले एक मकर (केकड़े) ने उस बगुले से पूछा कि 'तुम इन मछलियों को कहाँ ले जाते हो ? ॥८५॥ यह सुनकर बगुले ने उसे भी वही उत्तर दिया जो मछलियों को दिया था। तब उस डरे हुए मगरमच्छ (केकड़े) ने भी कहा कि 'मुझे भी ले चलो' ॥८६॥ उसके मांस के लालच से अन्धी बुद्धिवाला बगुला उसे भी लेकर जब मछलियों का वध करनेवाली चट्टान पर पहुँचा तो उन लाई हुई मछलियों के बची और बिखरी हुई हड्डियों के टुकड़ों को देखकर वह मगरमच्छ (केकड़ा) बगुले को विश्वासघाती मयंक समझ गया ॥८७-८८॥ तब उस बुद्धिमान मकर (केकड़े) ने उस बगुले द्वारा चट्टान पर रखते ही बगुले का गला काट लिया ॥८९॥ और, जाकर बची हुई मछलियों को सब समाचार सुनाया। उन सब ने भी प्राणदान देने वाले उसका अभिवादन करके कृतज्ञता स्वीकार की ॥९० ॥ १ पंचतन्त्र में यहाँ केकड़ा लिखा है जो उचित मालूम पड़ता है। अतः, आगे मकर के स्थान पर केकड़ा ही कोष्ठक में लिखा गया है।—अनु ९८