भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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द्वन्द्व सम्वाद ८१ लोहे का तराजू और वैश्यपुत्र की कथा इस प्रकार उपाय से काम निकाले जाते हैं। और भी मुझसे सुनो। प्राचीन काल में किसी वैश्य के पास पिता की सम्पत्ति में से केवल एक लोहे का तराजू बच गया था ॥२४०॥ चार सौ तोल लोहे से बने उस तराजू को किसी बनिये के पास अमानत (धरोहर) रखकर वह वैश्य दूसरे देश को चला गया ॥२४१॥ उसने लौटकर उस बनिये से जब अपना तराजू माँगा तब उस बनिये ने कहा—'उस को चूहे खा गये' ॥२४१॥ सचमुच वह लोहा बहुत मीठा था इसी से उसे चूहे खा गये।—यह सुनकर मन-ही- मन हँसते हुए वैश्यपुत्र ने उस बनिये से कहा ॥२४ ॥ और उसने भोजन की प्रार्थना की। उसने भी सन्तुष्ट होकर उसे भोजन देना स्वीकार कर लिया' ॥२४१॥ तब वह वैश्यपुत्र उस बनिये के छोटे पुत्र का एक आँवला देकर स्नान के लिए उसे साथ लेकर चला गया। स्नान के बाद वह बनिया उस वैश्यपुत्र को किसी मित्र के यहाँ छिपाकर रख आया और अकेला ही बनिये के घर भोजन के लिए आ गया ॥२४२ २४५॥ बच्चा कहाँ गया?—इस प्रकार पूछते हुए बनिये ने वणिकपुत्र ने कहा—'उस बालक को आकाश से नीचे आकर एक बाज उठा ले गया' ॥ २४४॥ उस बनिया द्वारा उसे न्यायालय में ले जाने पर भी उस वैश्यपुत्र ने वही कहा ॥२४५॥ 'यह असम्भव है। बाज बच्चे को उठाकर कैसे ले जा सकता है? सभा में उपस्थित व्यक्तियों द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वैश्यपुत्र बोला—जिस देश में लोहे का भारी तराजू चूहों से खाया जाता है वहाँ तो बाज हाथी को भी ले जा सकता है। बच्चे की तो बात ही क्या' ॥२४६-२४७॥ यह सुनकर कौतुक से सब समाचार पूछकर न्यायाधिकारियों ने उसे तराजू दिला दिया और वैश्यपुत्र ने भी बच्चे को लाकर बनिये को दे दिया ॥२४८॥ इस प्रकार बुद्धिमान् व्यक्ति उपाय से अपना काम बनाते हैं। तूने तो साहस करके स्वामी को संशय (खतरे) में डाल दिया है ॥ ४ ॥ करटक से यह सुनकर हँसता हुआ दमनक उससे बोला—तेरा डर व्यर्थ है। बैल के साथ युद्ध करने से सिंह की विजय के सिवा ही क्या हो सकती है ॥२५ ॥ मदोन्मत्त हाथी के दाँतों के अग्र कशा (पाशा) से अङ्कित सिंह कहाँ ! और चाबुक की मार से क्षत शरीरवाला गधा जैसा होनेवाला बैल कहाँ ! ॥ ५१॥ ११

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