भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक ८३ जब दोनों सियार इस प्रकार की बातें कर ही रहे थे कि पिंगलक सिंह ने युद्ध में संजीवक बैल को मार डाला ॥२५२॥ उस संजीवक बैल के मारे जाने पर, करटक के साथ दमनक मृगराज सिंह का फिर से स्वतन्त्र मन्त्रित्व पाकर प्रसन्नतापूर्वक रहने लगा ॥२५३॥ नरवाहनदत्त भी विप्र मन्त्री गोमुख से बुद्धि के चमत्कारों से भरी हुई इस विचित्र कथा को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥२५४॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियशो लम्बक का चतुर्थ तरंग समाप्त पञ्चम तरंग तदनन्तर, शक्तियशा के लिए उत्कंठित नरवाहनदत्त का विनोद करता हुआ गोमुख मन्त्री बोला ॥१॥ अगर जलानेवाले वैश्य की कथा तुमने बुद्धिमानों की कथाएँ सुनीं अब मूर्खो की कथा सुनो। किसी धनी बनिये का मूखबुद्धि नाम का एक बालक था ॥२॥ वह वैश्यपुत्र व्यापार के लिए एक बार कटाह द्वीप में गया। उसके व्यापारिक सामान म अगर की लकड़ी सबसे अधिक थी ॥३॥ अन्य माल को बेचकर धन कमाये हुए उस वैश्यपुत्र के अगर को वहाँ किसी ने नहीं खरीदा क्योंकि वहाँ के लोग अगर के महत्त्व को जानते ही न थे ॥४॥ तब उस वैश्यपुत्र ने लकड़हारों से कोयला खरीदते हुए वहाँ के निवासियों को देखकर सारी अगर की लकड़ी जलाकर उसका कोयला बना डाला। और, उसे कोयले के भाव म बेचकर घर आकर मित्रों म अपनी डींग हाँकने लगा तो सुनकर लोग उसकी हँसी करने लगे ॥५-६॥ तिल धोनेवाले मूर्ख कृषक की कथा अंगुरदाही की कथा तुमने सुनी अब तिलप्रक्षालक की कथा सुनो। एक स्थान पर भूत के समान एक मूर्ख किसान था ॥७॥