भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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द्वादश लम्बक ८२९ किसी से कहना नहीं गरुड़ के भय से यहाँ ठहरा हुआ मैं नाग हूँ। काम-मोहित उस नाग ने इस प्रकार अपना रहस्य उसे बता दिया ॥१७३॥ तब उस वेश्या ने यह बात एकान्त में अपनी माँ (कुट्टनी) से कह दी। कुछ दिनों के पश्चात् दैवयोग से पुरुष के रूप में नागा को ढूँढ़ता हुआ गरुड़ भी वहाँ आ पहुँचा और कुट्टनी के पास जाकर बोला कि आज मैं तुम्हारी बेटी के पास रहना चाहता हूँ मुँह माँगा मूल्य ले लो ॥१७४-१७५॥ कुट्टनी ने उससे कहा—'यहाँ एक नाग रहता है जो प्रतिदिन पाँच सौ हाथी देता है। तो एक दिन के मूल्य का क्या होता है ॥१७६॥ तब गरुड़ ने वहाँ पर ठहरे हुए उस नाग को जानकर अतिथि के रूप में वेश्या के घर में प्रवेश किया ॥१७७॥ वहाँ शयन के ऊपर बैठे हुए नाग को उसने देखा और अपने को प्रकट कर वह उछला और उस नाग को मारकर खा गया ॥१७८॥ 'इसलिए बुद्धिमान् व्यक्ति निरंकुश होकर स्त्रियों को कोई भी अपना गुप्त भेद न बताये' ऐसा कहकर गोमुख ने फिर मूर्खों की कथा कहनी प्रारम्भ की। ॥१७९॥ बेतालमूर्ख की कथा एक यथानामघट (ताँबे के घट) के पेटे के समान महान् सिरवाला था। किन्तु वह मूर्ख घट था और सिर पर बाल न होने के कारण समाज में लज्जित होता था ॥१८०॥ कुछ दिनों के पश्चात् उसका एक धूर्त अनुजीवी आकर उससे बोला—'एक वैद्य है जो बालों को उत्पन्न करने की ओषधि जानता है ॥१८१॥ यह सुनकर वह गंजा धनी बोला—'यदि तुम उस ओषधि को मँगा दो तो मैं तुम्हें और वैद्य को भी धन दूँगा ॥१८२॥ यह सुनकर सिरवाल उस उसका धन खाकर उस धूर्त उसने जिस एक धूर्त वैद्य को ले आया ॥१८३॥ बहुत दिनों तक उस मूर्ख का धन खाकर उस धूर्त वैद्य ने किसी युक्ति से अपनी पत्नी बुलाकर उस मूर्ख को धोखा भी क्या फिर सिखाया ॥१८४॥ वैद्य का गंजा देखकर भी उस मूर्ख ने गुप्त वैद्य युक्ति को समर्पण न दी। तब वैद्य ने उस मूर्ख से कहा— मैं स्वयं राजा दुःशासन सिर पर बाल पैदा करना चाहता हूँ। इसमें बहुत लगा है कारण इस लिए विश्वास था ॥१८५-१८६॥ जब मेरी स्त्री नहीं मानती तो ही विश्वास है मुझे। इस प्रकार कहकर वह वैद्य चला गया। इस प्रकार बाल बनने नहीं देखे उसके बाल भी पैदा करवा दिये ॥१८७॥