भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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इस प्रकार, हम दोनों इसे प्रातःकाल मार डालेंगे। तुम सबेरे ही मेरे घर पर आ जाना। ऐसा कहकर उसने उसे अपना घर दिखा दिया। उसके घर चले जाने पर मैं अपने घर लौट आया। मैं इसी क्रम में अनेक अद्भुत जन्मों का अनुभव कर चुका था ॥१६४-१६५॥ सबेरे ही तलवार हाथ में लेकर बन्धमोचनिका के घर गया और सोमदा काली घोड़ी के रूप में वहाँ आई ॥१६६॥ उस बन्धमोचनिका ने भी लाल घोड़ी का रूप धारण किया और खुरों एवं दांतों के प्रहार से उन दोनों का युद्ध प्रारम्भ हुआ। अवसर पाकर मेरे द्वारा प्रहार करने पर वह नीच डाग्न (सोमदा) बन्धमोचनिका से मार दी गई ॥१६७-१६८॥ तदनन्तर पशुता की दुर्व्यथा से छूटे हुए मैंने यह निश्चय किया कि अब मन से भी परस्त्री का संसर्ग न करूँगा ॥१६९॥ चंचलता, साहस और डायनपन—स्त्रियों के ये तीन दोष तीनों लोकों को भय देनेवाले हैं। इसलिए, डायन की सहेली बन्धुदत्ता का पीछा क्यों कर रहे हो, जिसका अपने पति के प्रति प्रेम नहीं है, वह तुमसे क्या स्नेह करेगी ? ॥१७०-१७१॥ मित्र भवशर्मा से इस प्रकार कहे जाने पर भी मैंने उसकी बात नहीं मानी, उसीसे इस गति को पहुँचा हूँ ॥१७२॥ इसीलिए, तुमसे भी कहता हूँ कि तुम भी अनुरागपरा से प्रेम न करो। वह किसी सजातीय विद्याधर के मिलने पर तुम्हें छोड़ देगी ॥१७३॥ जैसे मधुकरी नये-नये फूलों को चाहती है, उसी प्रकार स्त्री नये-नये यार को चाहती है। अतः हे मित्र ! तुम्हें भी मेरे ही समान पश्चात्ताप करना पड़ेगा ॥१७४॥ सोमस्वामी के प्रेम से भरे ये वचन निश्चयदत्त के हृदय में स्थान न पा सके ॥१७५॥ वह बोला—अनुरागपरा मेरे साथ कभी धोखा न करेगी, वह विशुद्ध विद्याधरी-वंश में जन्मी है ॥१७६॥ इस प्रकार, उन दोनों के वार्तालाप करते-करते सूर्य मानों निश्चयदत्त का प्रिय कार्य करने के लिए अस्ताचल को चल पड़ा। तदनन्तर रात आने पर अवदूती के समान वह शृंगोत्पादिनी यक्षिणी उसके समीप आई ॥१७७-१७८॥

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