भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक ८७५ जब वे बँटवारा करने लगे तब आपस में कम और अधिक भाग का झगड़ा खड़ा हो गया। तब उन्होंने एक वेदपाठी अध्यापक को निर्णायक माना। उसने कहा - 'तुम दोनों प्रत्येक वस्तु को दो भागों में बराबर बाँटो। इससे तुम दोनों में कम और अधिक का झगड़ा न होगा ॥१७३-१७४॥ मध्यस्थ (निर्णायक) की आज्ञा से उन दोनों ने मकान खाट बरतन पशु आदि सबके दो-दो बराबर टुकड़े करके बाँट लिये। अब उनके पिता की एक दासी रह गई। उसको भी काटकर उन दोनों ने दो टुकड़े कर डाले इस हत्या के अपराध में राजा ने उन दोनों का सब माल हरण करके उन्हें सजा दे दी ॥१७५-१७६॥ इस प्रकार, मूर्खजन धूर्तों के उपदेश से दोनों लोकों का नाश करते हैं। इसलिए, समझदार व्यक्ति को चाहिए कि वह धूर्तों का नहीं प्रत्युत विद्वानों की संगति करे ॥१७७॥ असन्तोष भी अच्छा नहीं होता। इस प्रसंग में एक कथा सुनो। कहीं पर कुछ साधु भिक्षा से सन्तोष कर हृष्ट-पुष्ट बने रहते थे। उन मोटे-ताजे साधुओं को देखकर कुछ मित्रों ने आपस में कहा - आश्चर्य है कि भीख माँगकर खानेवाले ये साधु भी इतने मोटे हुए हैं ॥१७८-१७९॥ तब उनमें से एक ने कहा - 'देखो मैं तुम्हें तमाशा दिखाता हूँ। भोजन करते हुए भी इन्हें मैं पहले के समान ही दुर्बल कर देता हूँ ॥१८०॥ ऐसा कहकर उसने उन साधुओं को क्रमशः अपने घर में निमन्त्रण देकर एक दिन बहुत- सुन्दर षड्रस भोजन कराया। वे मूर्ख साधु, उसके उत्तम और स्वादिष्ट भोजन का स्मरण करते हुए भिक्षा के भोजन से असन्तोष करने लगे और धीरे-धीरे दुर्बल हो गये ॥१८१ १८२॥ तब अपने मित्रों को बुलाकर उन साधुओं के सामने ही उस भोजन करानेवाले ने कहा- ॥१८३॥ 'मेरे यहाँ भोजन करने के पहले ये साधु भिक्षा के अन्न से ही हृष्ट-पुष्ट बने हुए थे। अब उस उत्तम भोजन का स्वाद पाकर इन्हें भिक्षा से असन्तोष हो गया इसलिए दुर्बल होने लगे ॥१८४॥ इसलिए, सुख चाहनेवाला बुद्धिमान् व्यक्ति मन को सदा सन्तुष्ट रखे। असन्तोष दोनों लोकों में असह्य और निरंतर दुःखदायी होता है' ॥१८५॥ इस प्रकार, उस मित्र से शिक्षा पाये हुए उसके मित्रों ने पापों के भांडार असन्तोष का त्याग कर दिया। सच है, सत्संग किसे कल्याणकारी नहीं होता ॥१८६॥