भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम स्तम्बक ८१५ एकबार मैं उनके द्वारा उपदिष्ट उपापद्म (व्रत) करने लगा। उस व्रत के मध्य में ही किसी एक दुष्ट ने मुझे सायंकाल में भोजन करा दिया। इस प्रकार व्रत के खण्डित हो जाने पर मैं गुह्यक (यक्ष) योनि में उत्पन्न हो गया। यदि व्रत को पूरा कर लेता तो स्वर्ग में देवता बन जाता ॥७६-७७॥ यह मैंने अपना समाचार तुम्हें सुनाया। अब तुम अपना परिचय मुझे दो कि तुम लोग इस मरुभूमि में क्यों आ गये हो ? ॥७८॥ यह सुनकर यशोधर ने उसे अपना वृत्तान्त सुनाया। तब वह यक्ष उन ब्राह्मण-पुत्रों से फिर बोला—॥७९॥ 'यदि ऐसी बात है तो मैं तुम दोनों को अपने प्रभाव से विद्याएँ प्रदान करता हूँ। तुम लोग विद्वान् होकर घर जाओ। व्यर्थ विदेश भ्रमण से क्या लाभ है ?' ॥८०॥ यह कहकर यक्ष ने उन्हें विद्याएँ प्रदान कीं और उसी यक्ष की कृपा से उन्होंने भी विद्याएँ प्राप्त कीं। तदनन्तर, यक्ष उन दोनों से बोला—'अब मैं तुम दोनों से गुरु-दक्षिणा माँगता हूँ। इस गुरु-दक्षिणा के रूप में तुम दोनों को मेरे लिए उपापद्म (व्रत) करना चाहिए। भूख वासना ब्रह्मचर्य रहना देवता की प्रदक्षिणा करना नियूमा के समय (दिन रहते) भोजन करना मन का संयम करना और क्षमा ये इस के आचरणीय नियम हैं। इस तरह व्रत करके इसका फल मुझे अर्पण कर देना। जिससे कि मुझे पूरे व्रत का फल (देवत्व) मिल जाय ॥८१-८४॥ उन विनम्र दोनों बन्धुओं से इस प्रकार कहकर और उनसे व्रत के लिए स्वीकार-वचन लेकर वह यक्ष उसी वृक्ष में अन्तर्हित हो गया ॥८५॥ बिना परिश्रम और प्रयत्न के अर्थ सिद्ध किए हुए उन दोनों ने रात बिताकर भोर अपने घर वापस आकर तथा माता-पिता को यह सारा वृत्तान्त सुनाकर उन्हें शान्ति दान दिया। तब उन दोनों ने अपने गुरु यक्ष के पुण्य के लिए उपापद्म नामक व्रत किया ॥८६-८७॥ तदनन्तर अप्सरायुक्त यक्ष विमान में बैठकर उनके पास आया और बोला—'मैं इस यक्ष योनि से मुक्त होकर तुम लोगों की कृपा से देवत्व प्राप्त कर लिया है, सो आत्म कल्याण के लिए तुम दोनों को भी यह व्रत करना चाहिए। इससे मृत्यु के पश्चात् तुम लोग भी देवता बनोगे और इस जीवन में मेरे वरदान से अक्षय धनी बनोगे। इस प्रकार कहकर वह कामचारी स्वर्ग को चला गया ॥८८-९१॥