कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
दशम स्तम्बक ८१५ एकबार मैं उनके द्वारा उपदिष्ट उपापद्म (व्रत) करने लगा। उस व्रत के मध्य में ही किसी एक दुष्ट ने मुझे सायंकाल में भोजन करा दिया। इस प्रकार व्रत के खण्डित हो जाने पर मैं गुह्यक (यक्ष) योनि में उत्पन्न हो गया। यदि व्रत को पूरा कर लेता तो स्वर्ग में देवता बन जाता ॥७६-७७॥ यह मैंने अपना समाचार तुम्हें सुनाया। अब तुम अपना परिचय मुझे दो कि तुम लोग इस मरुभूमि में क्यों आ गये हो ? ॥७८॥ यह सुनकर यशोधर ने उसे अपना वृत्तान्त सुनाया। तब वह यक्ष उन ब्राह्मण-पुत्रों से फिर बोला—॥७९॥ 'यदि ऐसी बात है तो मैं तुम दोनों को अपने प्रभाव से विद्याएँ प्रदान करता हूँ। तुम लोग विद्वान् होकर घर जाओ। व्यर्थ विदेश भ्रमण से क्या लाभ है ?' ॥८०॥ यह कहकर यक्ष ने उन्हें विद्याएँ प्रदान कीं और उसी यक्ष की कृपा से उन्होंने भी विद्याएँ प्राप्त कीं। तदनन्तर, यक्ष उन दोनों से बोला—'अब मैं तुम दोनों से गुरु-दक्षिणा माँगता हूँ। इस गुरु-दक्षिणा के रूप में तुम दोनों को मेरे लिए उपापद्म (व्रत) करना चाहिए। भूख वासना ब्रह्मचर्य रहना देवता की प्रदक्षिणा करना नियूमा के समय (दिन रहते) भोजन करना मन का संयम करना और क्षमा ये इस के आचरणीय नियम हैं। इस तरह व्रत करके इसका फल मुझे अर्पण कर देना। जिससे कि मुझे पूरे व्रत का फल (देवत्व) मिल जाय ॥८१-८४॥ उन विनम्र दोनों बन्धुओं से इस प्रकार कहकर और उनसे व्रत के लिए स्वीकार-वचन लेकर वह यक्ष उसी वृक्ष में अन्तर्हित हो गया ॥८५॥ बिना परिश्रम और प्रयत्न के अर्थ सिद्ध किए हुए उन दोनों ने रात बिताकर भोर अपने घर वापस आकर तथा माता-पिता को यह सारा वृत्तान्त सुनाकर उन्हें शान्ति दान दिया। तब उन दोनों ने अपने गुरु यक्ष के पुण्य के लिए उपापद्म नामक व्रत किया ॥८६-८७॥ तदनन्तर अप्सरायुक्त यक्ष विमान में बैठकर उनके पास आया और बोला—'मैं इस यक्ष योनि से मुक्त होकर तुम लोगों की कृपा से देवत्व प्राप्त कर लिया है, सो आत्म कल्याण के लिए तुम दोनों को भी यह व्रत करना चाहिए। इससे मृत्यु के पश्चात् तुम लोग भी देवता बनोगे और इस जीवन में मेरे वरदान से अक्षय धनी बनोगे। इस प्रकार कहकर वह कामचारी स्वर्ग को चला गया ॥८८-९१॥
८९६ कथासरित्सागर
८९६ कथासरित्सागर ततो यशोधरो लक्ष्मीधरश्च भ्रातरावुभौ। कृत्वा व्रतं तत्राप्तार्थविद्यावास्तां यथासुखम् ॥९१॥ एव धर्मप्रवृत्तानां शीलं कृच्छ्रेऽप्यमुञ्चताम्। देवता अपि रक्षन्ति कुर्वन्तीष्टार्थसाधनम् ॥९२॥ इत्य वसन्तकाख्यातकथामृतविनोदितः। मत्सेश्वरसुतं प्रेप्सु स शक्तियशसं प्रियाम् ॥९३॥ आहारसमये पित्रा समाहूतस्तदन्तिकम्। नरवाहनदत्तोऽथ ययौ स्वसचिवै सह ॥९४॥ अथानुरूपं भुक्त्वा च तत्र सायं स्वमन्दिरम्। वयस्यैः स निजैः साकमयासी गोमुखादिभिः ॥९५॥ तत्र च गोमुखो भूयो विनोदयितुमब्रवीत्। श्रूयतामिममन्यं वो देवाख्यामि कथाक्रमम् ॥९६॥ लब्धप्रणाशमकरवानरयोः कथा आसीद्रक्तमुखो नाम परिभ्रष्टः स्वयूथतः। उदुम्बरवने तीरे वारिधेर्वानिरर्षम ॥९७॥ तस्य भक्षयतो हस्ताच्च्युतमेकमुदुम्बरम्। जघास शिशुमारोऽत्र वारिराशिजलाशयः ॥९८॥ तत्फलास्वादहृष्टश्च स प्रचक्रे कलं रवम्। यद्वशात् स बहून्यस्मै फलानि कपिरक्षिपत् ॥९९॥ तथैव चाक्षिपन्नित्यं फलानि स तथैव च। शिशुमारो ऽत्त चक्रे जग्ने सख्यं ततस्तयोः ॥१००॥ तेनान्वहं तटस्थस्य जलस्थो निकटे कपेः। शिशुमारो दिनं स्थित्वा च सायं स्वगृहं ययौ ॥१०१॥ ज्ञाताथौ तस्य भार्या च सदा विरहदं विषा। कपिसख्यमनिच्छन्ती भाम्यव्याजमधिष्ठितम् ॥१०२॥ ब्रूहि प्रिये किमस्वास्थ्यं तव केन च शाम्यति। इत्यार्त्तस्तं स पप्रच्छ शिशुमार प्रियां मुहुः ॥१०३॥ निर्बन्धात्पृष्टापि यदा न सा प्रतिवचो ददौ। रहस्यज्ञा सखी तस्यास्तदा तं प्रत्यभाषत ॥१०४॥
दशम लम्बक ८९७
दशम लम्बक ८९७ तब वह यशोधर और लक्ष्मीधर, दोनों भाई यज्ञ करके यक्ष की कृपा से अक्षय धन और विद्या प्राप्त कर सुखपूर्वक रहने लगे ॥९१॥ इस प्रकार धर्म की ओर प्रवृत्ति रखनेवाले और दुःख में भी अपने चरित्र को सुरक्षित रखनेवालों की देवता भी रक्षा करते हैं ॥९२॥ इस प्रकार, वसन्तक द्वारा कही गई अद्भुत कथा से विनोदित और अपनी प्यारी शक्तियशा के लिए उत्कण्ठित वत्सेश्वर का पुत्र वह नरवाहनदत्त भोजन के समय अपने पिता के बुलाने पर अपने मन्त्रियों के साथ वहाँ गया और समुचित भोजन करके सायंकाल गोमुख आदि मन्त्रियों के साथ अपने भवन में आ गया ॥९३-९५॥ अपने भवन में आने पर पुनः उसका मनोरंजन करने के लिए गोमुख ने कहा—'सुनिए, मैं दूसरी कथा प्रारम्भ करता हूँ' ॥९६॥ मगर और बन्दर की कथा समुद्र के किनारे, गूलर के वन में अपने यूथ से छूटा हुआ रक्तमुख नाम का एक बन्दर था ॥९७॥ वृक्ष पर बैठकर गूलर खाते हुए उसके हाथ से छूटे हुए एक गूलर को समुद्र के जल में रहनेवाले एक शिशुमार नामक मगर ने खा लिया और उसके स्वाद से प्रसन्न होकर उसने मीठी आवाज दी। उसकी वाणी के रस से सन्तुष्ट बन्दर ने उसे बहुत-से गूलर के फल और फेंक दिये ॥९८-९९॥ इसी प्रकार, बन्दर, प्रतिदिन जल में फल फेंकता था और शिशुमार, उन्हें खाकर उसी प्रकार मधुर गान किया करता था। कुछ दिनों में उन दोनों की परस्पर मित्रता हो गयी ॥१००॥ इस कारण प्रतिदिन वह शिशुमार, तट पर रहनेवाले बन्दर के साथ फल खाता हुआ दिन व्यतीत कर सायंकाल अपने घर को जाता था ॥१०१॥ इस प्रकार सारे, दिन का विरह इनवाती बन्दर की मित्रता को न चाहनेवाली शिशुमार की स्त्री ने बीमारी का बहाना बनाया ॥१०२॥ तब अत्यन्त दुःखी शिशुमार ने पत्नी से पूछा—'प्रिये बताओ तुम्हें क्या रोग है और यह कैसे शान्त होगा ? ॥१०३॥ उसके इस प्रकार आग्रहपूर्वक पूछने पर भी जब उसकी स्त्री ने उत्तर न दिया तब उसके गुह्य को न जाननेवाली सखी ने उससे कहा—॥१०४॥ ११३
८९८ कथासरित्सागर
८९८ कथासरित्सागर यद्यपि त्वं न कुरुषे नेच्छस्येषा तथाप्यहम्। ब्रवीमि विदुष ह्येवं जनानां निह्रुतेः कथम्॥१०५॥ स तावदस्या भार्यायास्तत्कालोत्थो महागदः। विना वानरहृत्पद्मयूषं न शममेति यः॥१०६॥ इत्युक्तः स प्रियासख्या शिशुमारो व्यचिन्तयत्। कष्टं वानरहृत्पद्मं कुतः सम्प्राप्नुयामहम॥१०७॥ सख्युः करोमि धग्द्रोहं कपस्तत्किं ममोचितम्। सख्या किमथवा भार्या प्राणेभ्योऽप्यधिकप्रिया॥१०८॥ इत्यालोच्य स्वभार्यां तां शिशुमारो जगाद सः। तद्यानिष्याम्यखण्डं ते कपिं किं ब्रूयसे प्रिये॥१०९॥ इत्युक्त्वा स ययौ तस्य मित्रस्य निकटं कपेः। यथाप्रसङ्गमन्याद्य तमेवमवदत् कपिम्॥११०॥ अद्यापि न सखे दृष्टं गृहं भार्या च मे त्वया। तदेहि तत्र गच्छावो विध्यमार्यकमप्यहम्॥१११॥ भुज्यते यत्र नात्येत्य गृहमभ्य निरर्गलम्। प्रनृत्यन्त न दाराश्च कृतैव तन्न सोङ्गवम्॥११२॥ इति प्रतार्य जलभाववतार्याधिलम्ब्य च। वानरं शिशुमारस्तं गन्तुं प्रवृत्तोऽथ सः॥११३॥ गच्छन्तं तं स दृष्ट्वा च मानरहृच्चिन्ताकुलम्। सखेऽप्यापुद्यमद्य त्वां पश्यामीति स पृष्टवान्॥११४॥ नियन्धनाप पृच्छन्त मत्वा हस्तस्थितं च तम्। प्लवङ्गमं जगादथ शिशुमारो जहाशयः॥११५॥ अस्वस्था मे स्थिता भार्या सा च पथ्योपयोगि माम्। याचते कपिहृत्पद्मं तेनाद्य विमनाः स्थिता॥११६॥ श्रुत्वैतत्स भषस्तस्य कपिः प्राज्ञो व्यचिन्तयत्। हन्ततदर्थमानीय पापेनाहमिहामुना॥११७॥ अहो स्त्रीव्यसनाक्रान्तो मित्रद्रोहेऽप्युद्यतः। किं वा दन्तैः स्वमांसानि भूतग्रस्ता न खादति॥११८॥ इत्थं गच्छिन्नथ च प्राह शिशुमारं स वानरः। यद्येवं तत्त्वयतन्मे किं नास्तं प्रथमं मये॥११९॥
दशम लम्बक ८९९
दशम लम्बक ८९९ 'यद्यपि यह करना नहीं और-यह भी ऐसा चाहती नहीं तो भी कह देती हूँ कोई भी जानकार लोगों के दुःख को कैसे छिपा सकता है ? ॥११५॥ तुम्हारी पत्नी को ऐसा भीषण रोग उत्पन्न हो गया है जो बन्दर के हृदय-कमल के स्वरस के बिना दूर नहीं होता' ॥११६॥ पत्नी की सहेली से इस प्रकार कहा गया शिशुमार सोचने लगा—'दुःख है बन्दर का हृदय- कमल मुझे कहाँ मिलेगा ? ॥११७॥ यदि मैं अपने मित्र बन्दर के साथ विश्वासघात करूँ तो क्या यह मेरे लिए उचित है ? अथवा मित्र से भी क्या ? पत्नी तो मेरी प्राणों से भी प्यारी है ॥११८॥ ऐसा सोचकर शिशुमार ने अपनी भार्या से कहा—'प्रिये क्या दुःखी होती है मैं तेरे लिए समूचा बन्दर ही ले आता हूँ ॥१२०॥ ऐसा कहकर शिशुमार, अपने मित्र बन्दर के पास गया। बातों के प्रसंग में बन्दर से वह इस प्रकार बोला—'मित्र अभी तक तुमने मेरा घर और मेरी पत्नी को नहीं देखा। सो चलो एक ही दिन के विश्राम के लिए सही जहाँ पर जाकर परस्पर प्रेमपूर्वक भोजन नहीं किया जाता और अपनी-अपनी स्त्रियाँ नहीं दिखाई जाती वहाँ मित्रता नहीं कपट-मात्र है ॥१२१ -१२२॥ इस प्रकार, बन्दर को धोखे से समुद्र में उतारकर और उसे पकड़कर वह शिशुमार अपने घर के लिए चल पड़ा ॥१२३॥ बन्दर ने चकित और व्याकुल होकर उसे जाते हुए देखकर पूछा—'मित्र इस समय मैं तुम्हें कुछ दूसरे ही रूप में देख रहा हूँ। तब वह मूढ़हृदय शिशुमार बन्दर से इस प्रकार कहने लगा— 'मेरी पत्नी अस्वस्थ है और वह अपने रोग के लिए बन्दर का हृदय मांगती है इसलिए मैं बेचैन हूँ' ॥१२४-१२६॥ उसकी यह बात सुनकर बुद्धिमान् बन्दर सोचने लगा—'ओह इसीलिए यह दुष्ट मुझे यहाँ लाया है ॥१२७॥ स्त्री के व्यसन का मारा हुआ यह मित्रद्रोह पर उतर गया है भूत से आक्रान्त व्यक्ति क्या अपने ही दाँतों से अपना ही मांस नहीं खा लेता ! ॥१२८॥ इस प्रकार सोचकर वह बन्दर शिशुमार से कहने लगा—'मित्र यदि ऐसी बात है तो तुमने मुझसे पहले ही क्यों नहीं बताया ॥१२९॥
८१८ कथासरित्सागर
८१८ कथासरित्सागर यद्यपि त्वं न ब्रूषे नेच्छन्त्यपा तथाप्यहम्। ब्रवीमि विबुधं हृदं जनानां निहूते कथम्॥१०५॥ स तादृगस्या भार्यायास्तवोत्पन्नो महागदः। विना वानरहृत्पद्मयूषं न शममेति यः॥१०६॥ इत्युक्तः स प्रियासख्या शिशुमारो व्यचिन्तयत्। कष्टं वानरहृत्पद्मं कुतः सम्प्राप्नुयामद्दम्॥१०७॥ सख्यं करोमि यद्ग्राहं कपेस्तत्किं ममाहितम्। सख्या किमथवा भार्या प्राणेभ्योऽप्यधिकप्रिया॥१०८॥ इत्यालोच्य स्वभार्यां तां शिशुमारो जगाद सः। तदहंनेष्याम्यखण्डं ते कपिं किं दूयसे प्रिये॥१०९॥ इत्युक्त्वा स ययौ तस्य मित्रस्य निकटं कपेः। कथाप्रसङ्गमूत्पाद्य तमवमबदत् कपिम्॥११०॥ अद्यापि न सखे दृष्टं गृहं भार्या च मे त्वया। तदहि तत्र गच्छावो विध्यमायकमप्यहः॥१११॥ भुज्यते यन्न नान्योन्यं गृहमभ्येत्य निर्गलम्। प्रहृष्यन्तं न दाराश्च कतव तन्न सौहृदम्॥११२॥ इति प्रतार्य जलधाववतार्याविस्रम्भ्य च। वानरं शिशुमारस्तं गन्तुं प्रवृवृत्तश्च सः॥११३॥ गच्छन्तं तं स दृष्ट्वा च वानरश्चकिताकुलम्। सखेऽन्यादृगमद्य त्वां पश्यामीति स पृष्टवान्॥११४॥ निबन्धेनापि पृच्छन्तं मत्वा हस्तस्थितं च तम्। प्लवङ्गमं जगादेव शिशुमारो जडाशयः॥११५॥ अस्वस्था मे स्थिता भार्या सा च पश्याद्ययापि माम्। यावत् कपिहृत्पद्मं तनाद्य विमनाः स्थिता॥११६॥ श्रुत्वैतस्य वचस्तस्य कपिः प्राज्ञा व्यचिन्तयत्। हन्तेतदवमानानां पापनाहमहामुना॥११७॥ अहो स्त्रीशब्धगात्राणां मित्रद्रोहस्यमुद्यतः। किं वा स्त्रीणां स्वमांसानां नूनमन्ता न गर्हति॥११८॥ इति सञ्चिन्त्य च प्राह शिशुमारं स वानरः। यद्येवं तत्स्वयत्नश्च किं नास्त प्रथमं मगे॥११९॥
दशम लम्बक ८९९
दशम लम्बक ८९९ 'यद्यपि तू करेगा नहीं और यह भी ऐसा चाहती नहीं तो भी कह देती हूँ कोई भी जानकार लोगों के दुःख को कैसे छिपा सकता है ? ॥१५॥ तुम्हारी पत्नी को ऐसा भीषण रोग उत्पन्न हो गया है, जो बन्दर के हृदय-कमल के स्वरस के बिना दूर नहीं होगा' ॥१६॥ पत्नी की सहेली से इस प्रकार कहा गया शिशुमार सोचने लगा-'दुःख है, बन्दर का हृदय कमल मुझे कहाँ मिलेगा ? ॥१७॥ यदि मैं अपने मित्र बन्दर के साथ विश्वासघात करूँ तो क्या यह मेरे लिए उचित है ? अथवा मित्र से भी क्या ? पत्नी तो मेरी प्राणों से भी प्यारी है ॥१८॥ ऐसा सोचकर शिशुमार ने अपनी भार्या से कहा- प्रिये क्यों दुःखी होती है, मैं तेरे लिए समूचा बन्दर ही ले आता हूँ ॥१ ९॥ ऐसा कहकर शिशुमार, अपने मित्र बन्दर के पास गया। बातों के प्रसंग में बन्दर से वह इस प्रकार बोला-'मित्र अभी तक तुमने मेरा घर और मेरी पत्नी को नहीं देखा। सो चलो एक ही दिन के विश्राम के लिए सही जहाँ घर जाकर परस्पर प्रेमपूर्वक भोजन नहीं किया जाता और अपनी-अपनी स्त्रियाँ नहीं दिखाई जाती वहाँ मित्रता नहीं कपट-मात्र है ॥११०-११२॥ इस प्रकार, बन्दर को धोखे से समुद्र में उतारकर और उसे पकड़कर वह शिशुमार अपने घर के लिए चल पड़ा ॥११३॥ बन्दर ने चकित और व्याकुल होकर उसे जाते हुए देखकर पूछा- मित्र इस समय मैं तुम्हें कुछ दूसरे ही रूप में देख रहा हूँ। तब वह मूर्खहृदय शिशुमार बन्दर से इस प्रकार कहने लगा- 'मेरी पत्नी अस्वस्थ है और वह अपने रोग के लिए बन्दर का हृदय माँगती है इसलिए मैं बेचैन हूँ ॥११४-११५॥ उसकी यह बात सुनकर बुद्धिमान् बन्दर सोचने लगा-आह, इसीलिए यह दुष्ट मुझे यहाँ लाया है ॥११७॥ स्त्री के व्यसन का मारा हुआ यह मित्रद्रोह पर उतर गया है भूत से आक्रान्त व्यक्ति क्या अपने ही दाँतों से अपना ही मांस नहीं खा लेता! ॥११८॥ इस प्रकार सोचकर वह बन्दर शिशुमार से कहने लगा-'मित्र यदि ऐसी बात है तो तुमने मुझे पहले ही क्यों नहीं बताया ॥११९॥
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर आगमिष्ये स्वमादाय हृत्पद्मं स्वस्त्रियाकृत । यासोद्युम्बरवृक्षे हि तद्विदानीं मम स्थितम् ॥१२०॥ सच्छ्रुत्वा शिशुमारस्तमार्त्तो मूर्खोऽब्रवीदिदम् । तर्ह्यतैवानयहि त्वमुदुम्बरतरोरिति ॥१२१॥ आनितायाम्बुधेस्तीरं शिशुमारः पुनः स तम् । तत्र तेनान्तकेनेव मुक्तः स च कपिस्तटम् ॥१२२॥ उत्पत्यारुह्य वृक्षाग्रं शिशुमारमुवाच तम् । गच्छ रे मूर्ख हृदयं देहाद्भवति किं पृथक् ॥१२३॥ मयैव मोचितो ह्यात्मा न चात्रेष्याम्यहं पुनः । किमत्र न श्रुता मूर्ख गर्दभाख्यायिका त्वया ॥१२४॥ कर्णहृदयहीनस्य गर्दभस्य कथा आसीद्गोमायुसचिवः सिंहः कोऽपि वने क्वचित् । ॥१२५॥¹ स जात्वासटकायावेनाप्त भूपेन केनचित् । आहुतो धृतिमञ्जीवन् कथमप्यविशद्गुहाम् ॥१२६॥ तत्र स्थित गते तस्मिन् राज्यनाहारनिःसहम् । तच्छेषाभिषवृत्तिः सन्गोमायुः सचिवोऽभ्यधात् ॥१२७॥ निर्गत्य किं यथाशक्ति नाहारं चिनुषे प्रभो । सीदत्येष शरीरं ते समं परिजनेन यत् ॥१२८॥ इत्युक्तः स शृगालेन तत्र सिंहो जगाद तम् । सखे नाहं व्रणाक्रान्तः शक्नोमि भ्रमितुं क्वचित् ॥१२९॥ खरस्य कर्णहृदयं भक्ष्यं प्राप्नोमि चेदहम् ॥ तन्मे व्रणानि रोहन्ति प्रकृतिस्थो भवामि च ॥१३०॥ तदानय कुतोऽपि त्वं गत्वा गर्दभमाशु मे । इत्युक्तस्तं गोमायुः स तथेति ययौ ततः ॥१३१॥ भ्रमञ्जलाश्रयान्तिके दृष्ट्वा रजकस्य स गर्दभम् ॥ प्रीत्येवोपत्य वक्ति स्म दुर्बलः किं भवानिति ॥१३२॥ १ मूलपुस्तके पदार्धं त्रुटितमस्ति ।
प्रथम काण्ड ११ और नृपके पहुँच ही वह महादुःख को न प्राप्त होगा क्योंकि जिस कन्या दुःख-समय गई है अथवा इस समय भी वह दुःख-समयका विश्वास न करके प्रसन्न हो रही है कह देती है ॥ इसप्रकार हँस और बातचितकर जब वह रात्रि बीत गई तब प्रभातकाल में उठ ऐसा कहने लगा कि वह सुरक्षित उपवन में तू रह मैं जाता हूँ और वहाँ से तुझे अपने साथ लियेआऊंगा तबतक तू यहीं पर ठहरना । इसप्रकार उससे कहकर वह दोनों तीरोंपर चढ़कर उस तालाबसे बाहर निकला- जबतक कि भगवान् मरीचिमाली सूर्यदेवका उदय न हुआहो। तबतक तो वह उस कन्याके पास आ पहुँचाजब उसका आगमन देखा तब दमयन्ती भयविह्वल हो उठी इत्यादि ॥ १ ॥ ॥ इति द्वितीय सर्ग समाप्त ॥ पश्चात् नलने राजासे कहा कि हे राजन् ! आप इस कन्याके स्वयंवरके लिये शीघ्र तय्यारी करें क्योंकि यह शुभलग्न बार बार नहीं प्राप्त होता ऐसा सुनकर नलने ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ...
९ कथासरित्सागर
९ कथासरित्सागर आगमिष्य स्वमादाय हृत्पद्मं त्वत्प्रियाकृते। वासोदुम्बरवृक्ष हि तदिदानीं मम स्थितम्॥१२०॥ सञ्छ्रुत्वा शिश्रुमारस्तमार्त्तो मूर्खोऽब्रवीदिदम्। तर्ह्येतदानयेहि त्वमुदुम्बरतरोर्चिरे॥१२१॥ आनितायाम्बुधेस्तीरं शिशुमारः पुन' स तम्। तत्र तनान्तकेनेव मुक्तः स च कपिस्तटम्॥१२२॥ उत्पत्यारुह्य वृक्षाग्रं शिशुमारमुवाच तम्। गच्छ रे मूर्ख हृदयं यद्वाङ्ग्भवति किं पृथक् ॥१२३॥ मयैव मोचितो ह्यात्मा न चात्रैष्याम्यहं पुनः। किमत्र न श्रुता मूर्ख गर्दभाख्यायिका त्वया॥१२४॥ कर्णहृदयहीनस्य गर्दभस्य कथा आसीद्गोमायुसचिवः सिंहः कोऽपि वने क्वचित्। ॥१२५॥¹ स जात्वाखेटकायातेनात्र भूपेन केनचित्। आहतो ह्तिमिश्चिद्वन् कथमप्यविशद्गुहाम्॥१२६॥ तत्र स्थितः गते तस्मिन् राजन्याहारनिःसहम्। तच्छेयामिषवृत्तिं सन्गोमायुः सचिवोऽभ्यधात् ॥१२७॥ निर्गत्य किं यथाशक्ति नाहारं चिनुषे प्रभो। सीदत्येव शरीरं ते मम परिजनेन यत्॥१२८॥ इत्युक्तः स शृगालेन तेन सिंहो जगाद तम्। सद्य नाहं व्रणश्रान्तः शक्नोमि भ्रमितुं क्वचित्॥१२९॥ खरस्य कर्णहृदयं भक्ष्यं प्राप्नोमि चेदहम्॥ तन्मे व्रणानि रोहन्ति प्रकृतिस्थो भवामि च॥१३०॥ तदानय कुतोऽपि त्वं गत्वा गर्दभमाशु मे। इत्युक्तस्तेन गोमायुः स तथेति ययौ ततः ॥१३१॥ भ्रमञ्जलान्तिकं लब्ध्वा रजकस्य स गर्दभम्॥ प्रीत्येवोपेतय वक्ति स्म दुर्बलः किं भवानिति॥१३२॥ १ मूलपुस्तके पदार्धं त्रुटितमस्ति।
दशम लम्बक ९५
दशम लम्बक ९५ इस प्रकार कहते हुए शियार से वह गधा बोला—'सदा अपने धोबी के बोझ ढोते-ढोते दुर्बल हो गया हूँ। इस प्रकार कहते हुए गधे से सियार ने कहा—॥१३३॥ 'यहाँ क्यों कष्ट उठा रहे हो भाम्रो। मैं तुम्हें स्वर्ग के समान सुख पहुँचानेवाले वन में पहुँचा देता हूँ। वहाँ तुम गधियों के साथ हृष्ट-पुष्ट हो जाओगे' ॥१३४॥ यह सुनकर भोग का लोभी वह गधा सियार की बात स्वीकार कर उसके साथ सिंह के वन को चला गया ॥१३५॥ गधे को देखकर उसके पीछे से आकर अस्वस्थता से दुर्बल सिंह ने उस पर अपने पंजे से आक्रमण कर दिया ॥१३६॥ इस प्रकार मार खाकर डरा हुआ गधा एकाएक भागकर चला आया और रोग से व्याकुल सिंह भी उसका पीछा न कर सका ॥१३७॥ सिंह भी अपने काम में असफल होकर शीघ्र ही अपनी गुफा में घुस गया। तब उस शियार मन्त्री ने उलाहना देते हुए सिंह से कहा—॥१३८॥ 'स्वामिन्, यदि तुम एक दुर्बल गधे को न मार सके तो हरिण आदि के मारने में तुम्हारी क्या दशा होगी' ॥१३९॥ यह सुनकर सिंह ने कहा-'तुम जैसा समझ रहे हो वैसी ही स्थिति है। अब तुम उस गधे को फिर लाओ और मैं तैयार होकर उसे मारता हूँ' ॥१४०॥ तब सिंह से फिर भेजे गये शियार ने गदहे के समीप आकर कहा-'तुम वहाँ से शीघ्र क्यों भाग आए ? ॥१४१॥ 'मुझे किसी प्राणी ने मारा' इस प्रकार कहते हुए गधे से सियार ने हँसकर कहा—॥१४२॥ 'तुम्हें व्यर्थ ही भ्रम हुआ है। वहाँ कोई ऐसा प्राणी नहीं है। मेरे जैसा ही व्यक्ति वहाँ रहता है ॥१४३॥ अत तुम मेरे साथ आओ। उस वन में निष्कंटक सुख है। इस प्रकार, उस शियार की बातों में फँसा हुआ वह मूर्ख गधा फिर वहाँ आया ॥१४४॥ उसे आते हुए देखते ही सिंह ने गुफा के मुँह से निकलकर, उसकी पीठ पर आक्रमण करके [L26: नखों से चीरकर उसे मार डाला ॥१४५॥ गधे को फाड़कर और सियार को उसका रक्षक नियुक्त करके थका हुआ सिंह नहाने के लिए चला गया ॥१४६॥ कपटी छली उस मूर्ख शियार ने अपना पेट भरने के लिए उस वध गदह के कान और हृदय को खा डाला ॥१४७॥
१२ कथासरित्सागर
१२ कथासरित्सागर कृशीभूतोऽस्मि रजकस्यास्य भारं वहन् सदा। इत्युक्तवन्तं च खरं तमुवाच स जम्बुकः ॥१३३॥ इह किं वहसि क्लेशमेहि त्वां प्रापयाम्यहम्। वनं स्वगसुखं यत्र खरीभिः सह वर्धसे ॥१३४॥ तच्छ्रुत्वा स तथेत्युक्त्वा गर्दभो भोगलोलुपः। वनं सिंहस्य तस्यागात्तेन गोमायुना सह ॥१३५॥ तं च दृष्ट्वैव तस्येत्य पृष्ठतो गर्दभस्य सः। सिंहो ददौ कराघातं प्रागवैक्लव्यदुर्बलम् ॥१३६॥ स तेन वीक्षितस्त्रस्तः पलाय्य सहसा खरः। आगच्छन्तं च तं सिंहोऽन्वपतद्विह्वलाकुलः ॥१३७॥ सिंहस्त्वसिद्धकार्यः स्वां त्वरितं प्राविशद् गुहाम्। ततस्तं जम्बुको गन्त्री सोपालम्भमभाषत ॥१३८॥ न हतो गर्दभोऽप्येष पराक्रम्येत त्वया प्रभो। हरिणादिवधे का सद्वात्ता तव भविष्यति ॥१३९॥ तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीत् सिंहो यथा वेत्सि तथा पुनः। तमानय खरं तावत् सञ्जो भूत्वा निहन्म्यहम् ॥१४०॥ इति स प्रेषितस्तेन पुनः सिंहेन जम्बुकः। गत्वा खरं तमवदद् विद्रुतं किं भवानिति ॥१४१॥ अहं सत्त्वेन केनापि ताडितोऽत्रेति वादिनम्। तं च भूयः स गोमायुर्विहस्य खरमब्रवीत् ॥१४२॥ मिथ्यैव विभ्रमो दृष्टस्त्वया न त्वत्र तादृशम्। सत्त्वमस्ति सुखं ह्यत्र वसाम्यहमपीदृशम् ॥१४३॥ तदेहाव मया साकं तन्निर्बाधिसुखं वनम्। इति वञ्चनया मूढस्तत्रागात् स खरः पुनः ॥१४४॥ आगतं तं च दृष्ट्वैव स निर्गत्य गुहामुखात्। निपत्य पृष्ठे व्यबधीदुपारिवारितं खरम् ॥१४५॥ निकृत्य गर्दभं तं च स्थापयित्वा च रक्षकम्। तस्यै व जम्बुकं भ्रान्तं सिंहः स्नातुं जगाम सः ॥१४६॥ तत्कालं जम्बुकस्तस्य स मायावी खरस्य तत्। भक्षयामास हृदयं कर्णौ पाप्यात्मतृप्तये ॥१४७॥
दशम लम्बक १०५
दशम लम्बक १०५ स्नान करके आये हुए सिंह ने बिना कान और हृदय के गधे को देखकर सियार से कहा कि 'इसके कान और हृदय कहाँ हैं? ॥१४८॥ यह सुनकर सियार ने कहा—'स्वामिन्, यह गधा तो पहले से ही बिना कान और हृदय का था अन्यथा यह (तुम्हारा चंगुल पाकर भागा हुआ) फिर यहाँ कैसे आ जाता ? ॥१४९॥ यह सुनकर और ठीक समझकर वह उस गधे को खा गया और उससे बचे हुए मांस को सियार ने चखा ॥१५०॥ यह कथा सुनकर वह बन्दर शिशुमार से बोला-'अब मैं फिर तेरे साथ आकर गधापन न करूँगा' ॥१५१॥ बन्दर से इस प्रकार फटकारा हुआ शिशुमार, अपनी स्त्री के कार्य की असफलता और हाथ से निकल गये मित्र के लिए चिन्ता करता हुआ अपने घर चला आया ॥१५२॥ शिशुमार के साथ बन्दर की मित्रता नष्ट समझकर उसकी स्त्री धीरे-धीरे स्वस्थ हो गई। और वह बन्दर भी समुद्र के तट पर आनन्दपूर्वक विचरण करने लगा ॥१५३॥ 'इसलिए बुद्धिमान् व्यक्ति दुष्ट मनुष्य पर कभी विश्वास न करे। दुर्जन और काले साँप पर विश्वास करने से भला कहाँ सुख मिल सकता है ? ॥१५४॥ मन्त्री गोमुख इस प्रकार कथा कहकर नरवाहनदत्त का मनोरञ्जन करता हुआ फिर बोला— अब हँसने योग्य कुछ मूर्खों की कथाएँ फिर सुनो। उनमें पहले गवैया को सन्तुष्ट करनेवाले मूर्ख की कथा सुनो ॥१५५-१५६॥ धनी और गवये की कथा किसी धनी रईस को किसी गवये ने गा-बजाकर सन्तुष्ट किया। तब उस धनी ने अपने मुनीम को बुलाकर गवैये के सामने कहा—'इस गवैया को पुरस्कार में दश हजार मुद्रा दे दो।' मुनीम ने उसे स्वीकार किया। जब गवैये ने जाकर उस मुनीम से रुपये माँगे तब मुनीम ने उसे जान-बूझकर रुपये नहीं दिये ॥१५७-१५९॥ तदनन्तर, गवैया ने जब उस रईस से जाकर रुपये के लिए कहा तब उसने उस गवैया से कहा-'तुमने मुझे क्या दिया है कि जिसके बदले में तुम्हें कुछ दूँ ॥१६०॥ तुमने वीणा बजाकर कुछ समय तक मेरे कानों को आनन्द दिया साथ ही मैंने भी तुम्हें पुरस्कार की राशि सुनाकर तुम्हारे कानों को आनन्दित कर दिया ॥१६१॥ ११०
९४ कथासरित्सागर
९४ कथासरित्सागर स्नात्वागतस्तथाभूतं स दृष्ट्वा गदभं हरिः। क्व कर्णौ हृदयं चास्येत्यपृच्छत् च जम्बुकम्॥१४८॥ जम्बुकः सोऽप्यवादीत्समकर्णहृदयः प्रभो। प्रागवासीत्कथं गत्वाप्यागच्छेदन्यथा ह्ययम्॥१४९॥ सच्छ्रुत्वा स तथैवेति मत्वा केसरर्यभक्षयत्। तन्मांसमन्यतच्छेषं जम्बुकोऽपि चखाद सः॥१५०॥ इत्याख्याय कपिर्भूयः शिशूमारमुवाच तम्। तन्नावेक्ष्यामह्यं भूयः करिष्यामि स्वरामितम्॥१५१॥ एवं तस्मात्कपः श्रुत्वा शिशूमारो ययौ गृहम्। मोहादसिद्ध भार्यार्थं क्षोभन्मित्रं च हारितम्॥१५२॥ तस्सव्यापगमाच्चास्य भार्या प्रकृतिमाययौ। कपिः सोऽप्यम्बुधेस्तीरे चचार च यथासुखम्॥१५३॥ तथैव विश्वसेन्नेव बुद्धिमान् दुर्जने जने। दुर्जने कृष्णसर्पे च कुतो विश्वासतः सुखम्॥१५४॥ इत्याख्याय कथां मन्त्री गोमुखः पुनरेव सः। नरवाहनदत्तं तं निजगाद विनोदयन्॥१५५॥ शृण्विदानीं क्रमादन्यानुपहास्यानिमान् जडान्। तत्रैमं शृणु गान्धर्वपरितोषकरं जडम्॥१५६॥ मापण्डस्य वणिकस्य च कथा कश्चिद् गान्धर्बिकनाड्यो गीतवाद्येन तोषितः। माण्डागारिकमाहूय तत्समक्षमभाषत॥१५७॥ देहि गान्धर्विकायास्मै द्वे सहस्रे पणानिति। एव करोमीत्युक्त्वा च स माण्डागारिको ययौ॥१५८॥ गान्धर्विकोऽथ गत्वा तान् पणास्तस्मादयाचत। न चास्मै स्थितसद्वित्तान् पणान् माण्डागरिको ददौ॥१५९॥ अथापृष्टस्तेन विज्ञाप्तस्तत्कृते वैणिकेन सः। उवाच किं त्वया दत्तं येन प्रतिददानि ते॥१६०॥ वीणावाद्येन मे क्षिप्रं त्वया श्रुतिसुखं कृतम्। तथैव दानवाक्येन कृतं क्षिप्रं मयापि ते॥१६१॥
दशम लम्बक १०७
दशम लम्बक १०७ यह सुनकर बेचारा निराश गवैंया हँसकर चला गया। इस प्रकार के कंजूस की कथा सुन कर पत्थरों को भी हँसी आती है॥१६२॥ मूर्ख शिष्यों की कथा महाराज अब दो मूर्ख शिष्यों की कथा सुनो। किसी गुरु के दो शिष्य थे जो आपस में द्वेष रखते थे। उनमें से एक शिष्य प्रतिदिन अपने गुरु के दाहिने पैर को तैल मालिश करके उसे धोता तथा उसकी सेवा करता था तो दूसरा उसी प्रकार बाँयें पैर की सेवा किया करता था॥१६३-१६४॥ किसी समय दाहिने पैर की मालिश करनेवाले शिष्य को गुरु के गाँव भेज देने पर, उस शिष्य के बाँयें पैर को धो लेने पर गुरु ने उससे कहा कि आज इसे भी तू ही धो दे। यह सुन कर वह मूर्ख शिष्य गुरु से बोला—'यह पैर, मेरे विरोधी का है। अतः मैं इसकी मालिश आदि कुछ न करूँगा। उसके इस प्रकार कहने पर भी जब गुरु ने उससे आग्रह किया तब अपने विरोधी साथी के क्रोध से उसने उस दाहिने पैर को पत्थर मारकर तोड़ दिया ॥१६५-१६८॥ गुरु के चिल्लाने पर, दूसरे शिष्यों ने आकर उस दुष्ट शिष्य को पीटना प्रारम्भ किया तब गुरु ने दुःख के कारण उसे छुड़वा दिया ॥१६९॥ दूसरे दिन गाँव से लौटकर आये हुए दूसरे शिष्य ने गुरु के पैर में वेदना देखकर उसका वृत्तान्त पूछा और जानकर क्रोध से जल उठा ॥१७०॥ और क्रुद्ध होकर वह कहने लगा—'यदि उसने ऐसा किया तो मैं भी क्यों न दूसरे (बाँयें) पैर को तोड़ डालूँ। इस प्रकार सोचकर और उस पैर को खींचकर उसे भी तोड़ दिया ॥१७१॥ तब अन्यान्य शिष्यों द्वारा मारे जाते हुए उसे भी टूटे पैरवाले गुरु ने छुड़वा दिया ॥१७२॥ इस प्रकार वे दोनों मूर्ख शिष्य सभी के लिए द्वेष और हास्य के पात्र बन गये। अपनी क्षमा के कारण प्रशंसनीय गुरु धीरे-धीरे स्वस्थ हो गये ॥१७३॥ 'हे स्वामिन् इस प्रकार आपस में द्वेष रखनेवाले सेवक अपने और स्वामी दोनों की हानि करते हैं ॥१७४॥ अब दो मुखावाले साँप की कथा सुनो। किसी साँप के आगे और पीछे दोनों ओर सिर था । ॥१७५॥
९०६ कथासरित्सागर
९०६ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वा विहताशोऽपि हसित्वा वणिको ययौ। कोनाशोक्त्यानया किं न हासो प्राज्ञोऽपि जायते ॥१६२॥ मूर्खशिष्ययोः कथा भीतशिष्यद्वय चव वेवेदानीं निशम्यताम्। गुरोः कस्याप्यभूतां द्वौ शिष्यावन्योन्यमत्सरी ॥१६३॥ तयोरेको गुरोस्तस्य दक्षिणं पादमन्वहम्। अभ्यञ्जन् क्षालयामास वामं पादं तथेतरः ॥१६४॥ दक्षिणाभ्यञ्जके जातु ग्रामं सम्प्रषिते गुरोः। अभ्यक्तवामपादं स द्वितीयं शिष्यमभ्यधात् ॥१६५॥ त्वमेव दक्षिणं पादमभ्यज्य क्षालयाद्य मे। श्रुत्वैतं मूर्खशिष्योऽसौ गुरुं स्वरमभाषत ॥१६६॥ प्रतिपक्षस्य सम्बन्धी न पादोऽभ्यङ्ग्य एष मे। एवमुक्तवतस्त्यास्य निर्बन्धं सोऽकरोद् गुरुः ॥१६७॥ ततो विपक्षतच्छिष्यरोषावादाय तस्य तम्। गुरोः शिष्यः स चरणं वसावु ग्राव्णा च भग्नवान् ॥१६८॥ मुक्ताक्रन्दे गुरौ तस्मिन् कुशिष्योऽन्यै प्रविश्य सः। ताड्यमानः सशोकन गुव्या तेन गोषितः ॥१६९॥ अन्येद्युः सोऽपरः शिष्यः प्राप्तो ग्रामाद्विलोक्य ताम्। अङ्घ्रिपीडां गुरोः पृष्टवृत्तान्तं प्रज्वलन्क्रुधा ॥१७०॥ नाहं भनज्मि किं पादं तस्य सम्बन्धनं द्विषः। इत्याकृष्य द्वितीयाङ्घ्रिं गुरोस्तस्य बभञ्ज सः ॥१७१॥ ततोऽत्र ताड्यमानोऽन्यैरपि मग्नोभयाङ्घ्रिणा। गुरुणा तेन कृपया कुशिष्यः सोऽप्यमोच्यत ॥१७२॥ सर्वद्वव्योपहास्यौ तौ शिष्यौ द्वौ ययतुस्ततः। गुरुश्च स्वक्षमाफलाभ्यां स्वस्थः सोऽप्यभवत् क्रमात् ॥१७३॥ एवमन्योन्यविद्विष्टौ मूर्खौ परिजनौ प्रभोः। स्वामिनोऽर्थं निहन्त्येव न भारमहितमश्नुते ॥१७४॥ अथ च द्विशिरः सर्पवृत्तान्तोऽप्यवधार्यताम्। कस्याप्यहेर्द्वे शिरसी अभूतामग्रपुच्छयोः ॥१७५॥
दशम लम्बक १०७
दशम लम्बक १०७ यह सुनकर बेचारा निराश गवैया हँसकर चला गया। इस प्रकार के कंजूस की कथा सुन कर पत्थरों को भी हँसी आती है॥१६२॥ मूर्ख शिष्यों की कथा महाराज अब दो मूर्ख शिष्यों की कथा सुनो। किसी गुरु के दो शिष्य थे जो आपस में द्वेष रखते थे। उनमें से एक शिष्य प्रतिदिन अपने गुरु के दाहिने पैर को तैल मालिस करके उसे धोता तथा उसकी सेवा करता था तो दूसरा उसी प्रकार बाँयें पैर की सेवा किया करता था॥१६३-१६४॥ किसी समय दाहिने पैर की मालिस करनेवाले शिष्य को गुरु के गाँव भेज देन पर, उस शिष्य के बाँय पैर को धो चुकने पर गुरु ने उससे कहा कि आज इसे भी तू ही धो दे। यह सुन कर वह मूर्ख शिष्य गुरु से बोला—'यह पैर, मेरे विरोधी का है। अतः मैं इसकी मालिस आदि कुछ न करूँगा। उसके इस प्रकार कहने पर भी जब गुरु ने उससे आग्रह किया तब अपने विरोधी साथी के क्रोध से उसने उस दाहिने पैर को पत्थर मारकर तोड़ दिया ॥१६५-१६८॥ गुरु के चिल्लाने पर, दूसरे शिष्यों ने आकर उस दुष्ट शिष्य को पीटना प्रारम्भ किया तब गुरु ने दुःख के कारण उसे छुड़ा दिया ॥१६९॥ दूसरे दिन गाँव से लौटकर आये हुए दूसरे शिष्य ने गुरु के पैर में वेदना देखकर उसका वृत्तान्त पूछा और जानकर क्रोध से जल उठा ॥१७०॥ और क्रुद्ध होकर वह कहने लगा—'यदि उसने ऐसा किया तो मैं भी क्यों न दूसरे (बाँयें) पैर को तोड़ डालूँ। इस प्रकार सोचकर और उस पैर को खींचकर उसे भी तोड़ दिया ॥१७१॥ तब अन्यान्य शिष्यों द्वारा मारे जाते हुए उसे भी टूटे पैरवाले गुरु ने छुड़वा दिया ॥१७२॥ इस प्रकार वे दोनों मूर्ख शिष्य सभी के लिए द्वेष और हास्य के पात्र बन गये। अपनी क्षमा के कारण प्रशंसनीय गुरु धीरे-धीरे स्वस्थ हो गये ॥१७३॥ 'हे स्वामिन् इस प्रकार आपस में द्वेष रखनेवाले सेवक अपने और स्वामी दोनों की हानि करते हैं ॥१७४॥ अब दो मुखावाले साँप की कथा सुनो। किसी साँप के आगे और पीछे दोनों ओर सिर थे। ॥१७५॥
१८ कथासरित्सागर
१८ कथासरित्सागर पुच्छं शिरस्त्वभूदद्य चक्षुष्मत्प्रकृतं पुनः । अहं मुख्यमहं मुख्यमित्यासीदाग्रहस्तयोः ॥१७६॥ सर्पस्तु प्रकृतेमेव मुखेन विषधार सः । एकदास्य शिरः पोच्छं मार्गे कष्टमवाप तत् ॥१७७॥ वेष्टयित्वा दृढं वृक्षं सर्पस्यास्यारुणद् गतिम् । ततस्तद्बलवन्मेने स सर्पोऽप्रशिरोजयि ॥१७८॥ तेनैव पाथेन तत स मुखेन भ्रमन्नहिः । अवटेऽग्नौ परिभ्रष्टो मार्गदृष्टेरदह्यत ॥१७९॥ एवं गुणस्य मेऽल्पस्य बहवो नान्तरं विदुः । ते हीनगुणसङ्गेन मूढा यान्ति पराभवम् ॥१८०॥ तण्डुलभक्षकस्य कथा इमं च शृणुतेदानीं भीतं तण्डुलभक्षकम् । आगात् कश्चित्पुमा मूर्खः प्रथमं श्वाशुरं गृहम् ॥१८१॥ स तत्र तण्डुलाञ्श्वश्र्वा पाकार्थं स्थापितान् सितान् । दृष्ट्वा भक्षयितुं तेषां मुष्टिं प्राक्षिपदानने ॥१८२॥ तत्क्षणादागतायां च श्वश्र्वां मूर्खः स तण्डुलान् । नाशकसन्निगिरितुं न चाप्युद्गिरितुं ह्रिया ॥१८३॥ तत्पीनोच्छूनगल्लं च निरालापमवेक्ष्य तम् । तद्रोगशङ्कयाहूय तच्छ्वश्रूः पतिमानयत् ॥१८४॥ सोऽप्यालोक्य निनायाशु वैद्यं वैद्योऽप्यपाटयत् । शोफशङ्की हनू तस्य मूर्खस्याक्रम्य मस्तकम् ॥१८५॥ निर्ययुर्लोकहासेन समं तस्य च तण्डुलाः । इत्यकार्यं करोत्यज्ञो न च जानाति गूहितुम् ॥१८६॥ गर्भवद्दुग्धदोहककथा कश्चिच्च दारका मूर्खा दृष्ट्वोहा गवाद्विषु । गर्भं प्राप्य समुद्ध्य दोग्धुमारेभिरे रसात् ॥१८७॥ कश्चिज्जुधुवदोहं कश्चिच्च क्षीरकुण्डमधारयत् । बह्र प्राथम्रिकान्येषां पयः पातुमवर्तत ॥१८८॥
द्वादश लम्बक ९९
द्वादश लम्बक ९९ पूंछ वाला सिर अन्धा था किन्तु प्राकृतिक सिर आँख वाला था। फिर भी उन दोनों सिरों में परस्पर मैं प्रधान हूँ मैं प्रधान हूँ यह विवाद हो गया। वह साँप अपने वास्तविक सिर से चलने-फिरने का काम लेता था। एक बार उसके पीछेवाले मुँह को मार्ग में बहुत कष्ट उठाना पड़ा ॥१७६-१७७॥ उसने कहीं (किसी चीज से) लिपट कर साँप की गति को आगे बढ़ने से रोक दिया। तब सर्प ने पिछले मुख को ही अगले सिर को जीतनेवाला बलवान् मान लिया ॥१७८॥ तब उसी अन्धे सिर से बाहर घूमता हुआ वह सर्प मार्ग न दीखने के कारण किसी गड्ढे में जलती हुई अग्नि में गिर गया और जलकर मर गया ॥१७९॥ इस प्रकार जो लोग गुण के थोड़े और बहुत अन्तर को नहीं जानते वे अल्प गुणवाले का संग करके दुर्दशा को प्राप्त होते हैं ॥१८०॥ चावल खानेवाले मूर्ख की कथा अब चावल खानेवाले मूर्ख की कथा सुनो। एक मूर्ख पहली बार अपनी ससुराल गया ॥१८१॥ वहाँ सास द्वारा पकाने के लिए रखे गये सफेद चावलों को देखकर उसने एक मुट्ठी चावल खाने के लिए मुँह में डाल लिया ॥१८२॥ उसी समय सास के आ जाने के कारण लज्जित वह मूर्ख न तो चावलों को चबाकर खा सका और न उगल ही सका ॥१८३॥ उसकी सास ने फूले गालवाले और बोलने में असमर्थ देखकर उस उसी समय अपने पति को बुलवाया ॥१८४॥ उस श्वसुर ने भी उसकी यह दशा देखकर वैद्य को बुलाया। वैद्य ने भी वात (सूजन) की आशंका से उसकी ठोढ़ी और सिर दोनों पकड़कर उसका मुँह खोल दिया ॥१८५॥ तब सास की हँसी के साथ ही उसके मुँह से चावल भी निकल पड़े। इस प्रकार मूर्ख अनर्थ तो कर देते हैं, किन्तु उन्हें छिपाना नहीं जानते ॥१८६॥ गधे का दूध दुहने की कथा एक समय कुछ मूर्ख बालकों ने माता को गाय भैंस आदि दुहते देखकर एक गधी को पकड़कर दुहना प्रारम्भ किया। कोई उसे दुहने लगा, किसी ने दुहने का पात्र पकड़ा और ऊपर कुछ बालक दूध पहले पियूँगा दूध पहले पियूँगा इस प्रकार कहकर परस्पर झगड़ने लगे॥१८७-१८८॥
११४ कथासरित्सागर
११४ कथासरित्सागर वस्त्यौषधं गुदे मूर्ख दीयते न तु पीयते। अह प्रतीक्षितं किं नेत्युपालभ्यत तेन स ॥११८॥ इतीष्टमप्यनिष्टाय जायतेऽविधिना कृतम्। तस्मान्न विधिमुत्सृज्य प्राज्ञः कुर्वीत किञ्चन ॥११९॥ मूर्ख पुरुषस्य तपस्विनाञ्च कथा अप्रेक्षापूर्वकारी च निन्द्यतेऽल्पहृतक्षणात्। तथा च कुत्रचित् कश्चित् जडबुद्धिरभूत् पुमान् ॥१२०॥ तस्य देशान्तरं यातुं गच्छतोऽन्वागतः सुतः। अटव्यां वासिते सार्थे विवेश विहरन् वनम् ॥१२१॥ पाटितो मर्कटैः सोऽत्र कुब्छाम्बीबधुपेत्य तम्। वृक्षानभिज्ञः पितरं पृच्छन्तमवदज्जडः ॥१२२॥ वनेऽस्मि पाटितः कैश्चित्सलोमशैः फलमक्षिभिः। तच्छ्रुत्वा क्रोधकृप्तासिस्तत्पिता तद्वनं ययौ ॥१२३॥ दृष्ट्वा फलान्यादधानाञ्जटिलांस्तत्र तापसान्। सोऽम्यधावत्क्षवोन्मीभिः सुतो मे लोमशैरिति ॥१२४॥ ऋक्षेस्तैः पाटितः पुत्रो मद्दृष्टैर्मा वधीर्मुनीन्। इत्थवार्यत पान्थेन तद्भ्रात् सोऽप्य केनचित् ॥१२५॥ ततः स वैशामुत्तीर्णं पावकात्सार्थमागतः। तन्न जातुचिदप्रेक्षापूर्वकारी भवेदबुधः ॥१२६॥ किमम्यत् सर्वथा भाव्यं जन्तुना कृतबुद्धिना। लोकोपहसिताः शश्वत् सीदन्त्येव ह्यबुद्धयः ॥१२७॥ तथा च निर्धनः कश्चित् प्राप्तवानध्वनि ब्रजन्। सार्थवाहस्य कस्यापि च्युतां हेममृतां वृतिम् ॥१२८॥ स मूढस्तां गृहीत्वैव न जगामान्यतोऽपि च। स्थित्वा तत्रैव सख्यातुमारेभे हेम तच्च तत् ॥१२९॥ तावत्स्मृत्वा हयारूढः प्रत्यागत्य स सत्वरम्। सार्थवाहोऽस्य दृष्टस्य हेमभस्त्रां जहार ताम् ॥१३०॥ ततः स वृष्टनष्टार्थः शोचन् प्रायादथामुखः। प्राप्तोऽप्यर्थः क्षणादेव हार्यते मन्दबुद्धिना ॥१३१॥