भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

पृष्ठ 961, कुल 1079 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 961

दशम लम्बक १०७ यह सुनकर बेचारा निराश गवैया हँसकर चला गया। इस प्रकार के कंजूस की कथा सुन कर पत्थरों को भी हँसी आती है॥१६२॥ मूर्ख शिष्यों की कथा महाराज अब दो मूर्ख शिष्यों की कथा सुनो। किसी गुरु के दो शिष्य थे जो आपस में द्वेष रखते थे। उनमें से एक शिष्य प्रतिदिन अपने गुरु के दाहिने पैर को तैल मालिस करके उसे धोता तथा उसकी सेवा करता था तो दूसरा उसी प्रकार बाँयें पैर की सेवा किया करता था॥१६३-१६४॥ किसी समय दाहिने पैर की मालिस करनेवाले शिष्य को गुरु के गाँव भेज देन पर, उस शिष्य के बाँय पैर को धो चुकने पर गुरु ने उससे कहा कि आज इसे भी तू ही धो दे। यह सुन कर वह मूर्ख शिष्य गुरु से बोला—'यह पैर, मेरे विरोधी का है। अतः मैं इसकी मालिस आदि कुछ न करूँगा। उसके इस प्रकार कहने पर भी जब गुरु ने उससे आग्रह किया तब अपने विरोधी साथी के क्रोध से उसने उस दाहिने पैर को पत्थर मारकर तोड़ दिया ॥१६५-१६८॥ गुरु के चिल्लाने पर, दूसरे शिष्यों ने आकर उस दुष्ट शिष्य को पीटना प्रारम्भ किया तब गुरु ने दुःख के कारण उसे छुड़ा दिया ॥१६९॥ दूसरे दिन गाँव से लौटकर आये हुए दूसरे शिष्य ने गुरु के पैर में वेदना देखकर उसका वृत्तान्त पूछा और जानकर क्रोध से जल उठा ॥१७०॥ और क्रुद्ध होकर वह कहने लगा—'यदि उसने ऐसा किया तो मैं भी क्यों न दूसरे (बाँयें) पैर को तोड़ डालूँ। इस प्रकार सोचकर और उस पैर को खींचकर उसे भी तोड़ दिया ॥१७१॥ तब अन्यान्य शिष्यों द्वारा मारे जाते हुए उसे भी टूटे पैरवाले गुरु ने छुड़वा दिया ॥१७२॥ इस प्रकार वे दोनों मूर्ख शिष्य सभी के लिए द्वेष और हास्य के पात्र बन गये। अपनी क्षमा के कारण प्रशंसनीय गुरु धीरे-धीरे स्वस्थ हो गये ॥१७३॥ 'हे स्वामिन् इस प्रकार आपस में द्वेष रखनेवाले सेवक अपने और स्वामी दोनों की हानि करते हैं ॥१७४॥ अब दो मुखावाले साँप की कथा सुनो। किसी साँप के आगे और पीछे दोनों ओर सिर थे। ॥१७५॥

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · पृष्ठ 961, कुल 1079 में से · BharatKosha