भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक १०५ स्नान करके आये हुए सिंह ने बिना कान और हृदय के गधे को देखकर सियार से कहा कि 'इसके कान और हृदय कहाँ हैं? ॥१४८॥ यह सुनकर सियार ने कहा—'स्वामिन्, यह गधा तो पहले से ही बिना कान और हृदय का था अन्यथा यह (तुम्हारा चंगुल पाकर भागा हुआ) फिर यहाँ कैसे आ जाता ? ॥१४९॥ यह सुनकर और ठीक समझकर वह उस गधे को खा गया और उससे बचे हुए मांस को सियार ने चखा ॥१५०॥ यह कथा सुनकर वह बन्दर शिशुमार से बोला-'अब मैं फिर तेरे साथ आकर गधापन न करूँगा' ॥१५१॥ बन्दर से इस प्रकार फटकारा हुआ शिशुमार, अपनी स्त्री के कार्य की असफलता और हाथ से निकल गये मित्र के लिए चिन्ता करता हुआ अपने घर चला आया ॥१५२॥ शिशुमार के साथ बन्दर की मित्रता नष्ट समझकर उसकी स्त्री धीरे-धीरे स्वस्थ हो गई। और वह बन्दर भी समुद्र के तट पर आनन्दपूर्वक विचरण करने लगा ॥१५३॥ 'इसलिए बुद्धिमान् व्यक्ति दुष्ट मनुष्य पर कभी विश्वास न करे। दुर्जन और काले साँप पर विश्वास करने से भला कहाँ सुख मिल सकता है ? ॥१५४॥ मन्त्री गोमुख इस प्रकार कथा कहकर नरवाहनदत्त का मनोरञ्जन करता हुआ फिर बोला— अब हँसने योग्य कुछ मूर्खों की कथाएँ फिर सुनो। उनमें पहले गवैया को सन्तुष्ट करनेवाले मूर्ख की कथा सुनो ॥१५५-१५६॥ धनी और गवये की कथा किसी धनी रईस को किसी गवये ने गा-बजाकर सन्तुष्ट किया। तब उस धनी ने अपने मुनीम को बुलाकर गवैये के सामने कहा—'इस गवैया को पुरस्कार में दश हजार मुद्रा दे दो।' मुनीम ने उसे स्वीकार किया। जब गवैये ने जाकर उस मुनीम से रुपये माँगे तब मुनीम ने उसे जान-बूझकर रुपये नहीं दिये ॥१५७-१५९॥ तदनन्तर, गवैया ने जब उस रईस से जाकर रुपये के लिए कहा तब उसने उस गवैया से कहा-'तुमने मुझे क्या दिया है कि जिसके बदले में तुम्हें कुछ दूँ ॥१६०॥ तुमने वीणा बजाकर कुछ समय तक मेरे कानों को आनन्द दिया साथ ही मैंने भी तुम्हें पुरस्कार की राशि सुनाकर तुम्हारे कानों को आनन्दित कर दिया ॥१६१॥ ११०