भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक ८९९ 'यद्यपि तू करेगा नहीं और यह भी ऐसा चाहती नहीं तो भी कह देती हूँ कोई भी जानकार लोगों के दुःख को कैसे छिपा सकता है ? ॥१५॥ तुम्हारी पत्नी को ऐसा भीषण रोग उत्पन्न हो गया है, जो बन्दर के हृदय-कमल के स्वरस के बिना दूर नहीं होगा' ॥१६॥ पत्नी की सहेली से इस प्रकार कहा गया शिशुमार सोचने लगा-'दुःख है, बन्दर का हृदय कमल मुझे कहाँ मिलेगा ? ॥१७॥ यदि मैं अपने मित्र बन्दर के साथ विश्वासघात करूँ तो क्या यह मेरे लिए उचित है ? अथवा मित्र से भी क्या ? पत्नी तो मेरी प्राणों से भी प्यारी है ॥१८॥ ऐसा सोचकर शिशुमार ने अपनी भार्या से कहा- प्रिये क्यों दुःखी होती है, मैं तेरे लिए समूचा बन्दर ही ले आता हूँ ॥१ ९॥ ऐसा कहकर शिशुमार, अपने मित्र बन्दर के पास गया। बातों के प्रसंग में बन्दर से वह इस प्रकार बोला-'मित्र अभी तक तुमने मेरा घर और मेरी पत्नी को नहीं देखा। सो चलो एक ही दिन के विश्राम के लिए सही जहाँ घर जाकर परस्पर प्रेमपूर्वक भोजन नहीं किया जाता और अपनी-अपनी स्त्रियाँ नहीं दिखाई जाती वहाँ मित्रता नहीं कपट-मात्र है ॥११०-११२॥ इस प्रकार, बन्दर को धोखे से समुद्र में उतारकर और उसे पकड़कर वह शिशुमार अपने घर के लिए चल पड़ा ॥११३॥ बन्दर ने चकित और व्याकुल होकर उसे जाते हुए देखकर पूछा- मित्र इस समय मैं तुम्हें कुछ दूसरे ही रूप में देख रहा हूँ। तब वह मूर्खहृदय शिशुमार बन्दर से इस प्रकार कहने लगा- 'मेरी पत्नी अस्वस्थ है और वह अपने रोग के लिए बन्दर का हृदय माँगती है इसलिए मैं बेचैन हूँ ॥११४-११५॥ उसकी यह बात सुनकर बुद्धिमान् बन्दर सोचने लगा-आह, इसीलिए यह दुष्ट मुझे यहाँ लाया है ॥११७॥ स्त्री के व्यसन का मारा हुआ यह मित्रद्रोह पर उतर गया है भूत से आक्रान्त व्यक्ति क्या अपने ही दाँतों से अपना ही मांस नहीं खा लेता! ॥११८॥ इस प्रकार सोचकर वह बन्दर शिशुमार से कहने लगा-'मित्र यदि ऐसी बात है तो तुमने मुझे पहले ही क्यों नहीं बताया ॥११९॥