कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम लम्बक ७५ उससे इसप्रकार कहा गया वह ज्ञानी बन्दर बोला—'जाओ उसकी दी हुई विद्या के प्रभाव से सोई हुई उसे गोद में उठाकर ले आओ। तब मैं तुम एक महान् आश्चर्य दिखाऊँगा ॥२२२ २२३॥ यह सुनकर निश्चयदत्त आकाश-मार्गस वहाँ गया और सोती हुई अनुरागपरा को धीरे से गोद में उठाकर सोमस्वामी बन्दर के समीप ले आया। पहले शाप और फिर विद्याधरी के द्वारा विद्या के बल से अदृश्य कर दिये गये उस विद्याधर का विद्याधरी के शरीर से लग रहने पर भी निश्चयदत्त ने नही देखा ॥२२४-२२६॥ उसके बाद उस दिव्य दृष्टिवाले बन्दर ने निश्चयदत्त को ऐसा योग बताया जिससे निश्चयदत्त ने विद्याधरी के गाल से चिपक हुए विद्याधर को देख लिया। देखते ही ओह ! यह क्या ? —ऐसा कहते हुए उस तत्त्वदर्शी बानर ने सब यथार्थ बात बता दी ॥२२७ २२८॥ यह दृश्य देखकर निश्चयदत्त के क्रुद्ध होने पर वह विद्याधर आकाश में उड़ गया। और, वह अनुरागपरा भी निद्रा से जागकर अपने रहस्य का भण्डाफोड़ देखकर लज्जा से नीचा मुंह किये बैठ गई ॥२२९ २३०॥ तब रोते हुए निश्चयदत्त ने कहा—हे पापिन ! मेरे ऊपर विश्वास करनेवाले मुझे तुमने क्यों ठग लिया? ॥२३१॥ अत्यन्त चंचल पार का बाँधने की युक्ति है। परन्तु चंचल स्त्री-चित्त को जानने या बाँधने की कोई शक्ति नही ॥२३२॥ उसके ऐसा कहने पर वह अनुरागपरा उत्तर दिये बिना ही धीरे-धीरे रोती हुई आकाश में उड़कर अपने घर चली गई ॥२३३॥ तब वह बानर सोमस्वामी निश्चयदत्त से बोला—मेरे कहने पर भी जो तुम इस स्त्री के पीछे दौड़ रहे थे, उसी तीव्र प्रमात्ति का यह फल है कि आज दुःख पा रहे हो। चंचल धन और स्त्री का क्या विश्वास ? ॥२३४ २३५॥