कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८ नाश करने वाले मुहूर्तों के पास आता है।।१४।। अस्मादपद्रवन्ति स आगच्छति विरजां नदीं तां मनसैवात्येति तत्सुकृतदुष्कृते धूनुते ।।१५।। वे उसे देखते ही भाग जाते हैं, पीछे वह विरजा नाम की नदी के पास आता है, इसे नदी के मन से अतिक्रमण करता है। इस स्थान पर वह अपने सुकृत और दुष्कृतका त्याग करता है।।१५।। तस्य प्रिया ज्ञातयः सुकृतमुपयन्त्यप्रिया दुष्कृतं तद्यथा रथेन धावयन्नथचक्रे पर्यवेक्षत एवं । ।१६ ।। उसके प्रिय कुटुम्बी-उपासना करने वाले उसके सुकृत को प्राप्त करते हैं और उसका अप्रिय करने वाले, उसके दुष्कृत को लेते हैं। जैसे रथ में बैठकर जल्दी से गमन करने वाला पुरुष रथ के चक्र की तरफ दृष्टि करता है वैसे ही वह दिन और रात्रि को देखता है ।।१६ ।। सुकृतदुष्कृते सर्वाणि च द्वन्द्वानि स एष विसुकृतो विदुष्कृतो ब्रह्म विद्वान्ब्रह्मैवाभिप्रैति ।।१७।। इसी प्रकार सुकृत और दुष्कृत तथा सर्व द्वन्द्व भावों को देखता है इस प्रकार सुकृत और दुष्कृत. से रहित होकर ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म के प्रति जाता है।।१७।। स आगच्छति इल्यं वृक्षं तं ब्रह्मगन्धः प्रविशति स आगच्छति सालुज्यं संस्थानं तं ब्रह्म स प्रविशति आगच्छत्य- पराजितमायतनं ।।१८ ।। वह इल्य नाम के वृक्ष के पास आता है, उसको ब्रह्म की गंध आती हैं पीछे सालज्य नाम के शहर के पास आता है, उसमें ब्रह्म तेज. का प्रवेश होता है, पीछे वह अपराजित महल के पांस आता है ।।१८ ।।