कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६ तं ब्रह्मतेजः प्रविशति स आगच्छतीन्द्रप्रजापती द्वारगोपौ तावस्मादपद्रवतः स आगच्छति विभुप्रमितं ब्रह्मयश प्रविशति । १९६. १ ।। उसमें ब्रह्म तेज प्रवेश करता है। पीछे जिस स्थान पर इन्द्र और प्रजापति द्वारपाल हैं वहां आता है। वे उसे देख कर भाग जाते हैं। वह विभु नाम के कमरे में आता है तब उसमें ब्रह्म का यश प्रवेश करता है ।।१९६।। स आगच्छति विचक्षणामासन्दी बृहद्रथन्तरे सामनी पूर्वौ पादौ श्यैत नौधसे चापरौ पादौ वैरूपवैराजे शाक्वररैवते तिरश्ची ।।२०।। वह विलक्षण नाम की गद्दी के पास आता है। इस गद्दी के पूर्व की तरफ के दो पाद बृहत् और रथंतर नाम के साम हैं। श्यैत और नौधस उसकी पश्चिम तरफ के पाद हैं। विरूप और वैराज साम उसके उत्तर और दक्षिण के कोण हैं और शाक्वर और रैवत साम पूर्व पश्चिम की तरफ के कोण हैं ।।२०।। सा प्रज्ञा प्रज्ञया हि विपश्यति स आगच्छत्यमितौजसं पर्यङ्कं स प्राणस्तस्य भूतं च भविष्यच्च पूर्वौ पादौ श्रीश्चेरा चापरौ बृहद्रथन्तरे अनूच्ये ।।२१।। यह वेदी ज्ञान रूप है। प्रज्ञा से वह सबको देखता है। पीछे वह उत्कृष्ट तेज वाले पलंग के पास आता है। यह पलंग प्राण रूप है, भूत और भविष्य उसके पूर्व पाद हैं, श्री और पृथिवी उसके पश्चिम पाद हैं ।।२१।। भद्रयज्ञायज्ञीये शीर्षण्यमृतश्च सामानि च प्राचीनातानं यजूंषि तिरश्चीनानि सोमांशव उपस्तरणमुद्गीथ उपश्रीः ।।२२।। बृहत् और रथंतर नाम के साम उत्तर और दक्षिण तरफ की पाटी हैं, भद्र और यज्ञायज्ञीय पूर्व और पश्चिम की तरफ की पाटी हैं। ऋक्