कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपासना करे अथवा चन्द्र की ओर दो दूर्वांकुर फेंक कर कहे—"हे मरण रहित आनन्दमय देव चन्द्र में रहे हुए तेरे कोमल हृदय से ऐसा करो कि मुझे मेरे पुत्र के आपत्ति सम्बन्धी शोक करने का प्रसंग कभी न आवे।" उसकी सन्तति उसके आगे कभी नहीं मरेगी जिसके पहिले से पुत्र है उसके सम्बन्ध में यह समझना ।। जिसके अभी पुत्र नहीं है उसके सम्बन्ध में कहते हैं—ऐसा मनुष्य आगे लिखी हुई ऋग्वेद की तीन ऋचायें पठन करे—"आप्या यस्व समेतु ते" (ऋ० १-६१-१६) (हे सोम तेरी समृद्धि हो और तेरे अंगों में सामर्थ्य प्राप्त हो), "सन्तेपयाँसि समुयन्तु वाजा" (ऋ० १-३१-४) (दूध और अन्न तुझे प्राप्त हो), "यमादित्या अंशुमाप्या ययन्ति" (ऋ० १-६१-१८) (जिस किरण को सूर्य आनन्दमयं बनाता है)। इन तीन ऋचाओं का जप करके वह प्रार्थना करे—"हमारे प्राण, सन्तति और हमारे पशु इनसे (हमारे शत्रुओं को) समृद्ध न कर। जो हमारा द्वेष करते हैं और जिनका हम द्वेष करते हैं उनका प्राण, उनकी सन्तति, उनके पशु इनसे हमारी समृद्धि करे। इस प्रकार मैं दैवी आवृत्ति करता हूँ।" ऐसा कहकर चन्द्र की तरफ दाहिना हाथ ऊंचा करके पुनः दूर्वांकुर प्रदान करे ।।१६।। अथ पौर्णमास्यां पुरस्ताच्चन्द्रमसं दृश्यमानमुपतिष्ठेतैतयैवावृता सोमो राजासि विचक्षणः पञ्चमुखोऽसि प्रजापतिर्ब्राह्मणस्त एकं मुखं तेन मुखेन राज्ञोऽत्सि ।।२०।। पौर्णमासी के दिन चन्द्र पूर्व की ओर दिखाई देता है। उसकी इसी प्रकार पूजा करते समय यह प्रार्थना करे—"तू सोम है, राजा है, ज्ञानी है, पंच मुख वाला है, प्रजापति है, ब्राह्मण मेरा एक मुख है उस एक मुख से तू राजाओं को खाता है ।।२०।। तेन मुखेन मामन्नादं कुरु ।। राजा त एकं मुखं तेन मुखेन विशोऽत्सि तेनैव मुखेन मामन्नदं कुरु ।। श्येनस्त एकं मुखं तेन