भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

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२१ मुखेन पक्षिणोऽत्सि तेन मुखेन मामन्नादं कुरु ।।२१।। उसी मुख से मुझे अन्न खाने वाला कर। क्षत्रिय तेरा एक मुख है, उस मुख से तू वैश्यों को खाता है। उसी मुख में मुझे अन्न खाने वाला कर। श्येन पक्षी तेरा एक मुख है, उस मुख से तू पक्षियों को खाता है। उसी मुख से तू मुझे अन्न खाने वाला कर ।।२१।। अग्निस्त एकं मुख तेन मुखेनेमं लोकमत्सि तेन मुखेन मामन्नादं कुरु। त्वयि पञ्चमं मुखं तेन मुखेन सर्वाणि भूतान्यत्सि तेन मुखेन मामन्नादं कुरु।। मास्माकं प्राणेन प्रजया पशुभिरवक्षेष्ठा ।।२२।। अग्नि तेरा एक मुख है, उस मुखसे तू इस लोक को खाता है। उस मुख से तू मुझे अन्न खाने वाला कर। तुझमें पाँचवाँ मुख है उससे तू सब भूतों को खाता है, उससे तू मुझे अन्न खाने वाला कर। हमारे प्राण, हमारी सन्तति, हमारे पशु इनसे तेरा क्षय न हो ।।२१।। योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तस्य प्राणेन प्रजया पशुभिरवक्षीयस्वेति स्थितिदैवीमावृतमावर्त आदित्यस्यावृतमन्वावर्त इति दक्षिणं बाहुमन्वावर्तते ।।२२।। जो हमारा द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं उसका प्राण, उसकी सन्तति, उसके पशु इनसे तू क्षीण हो” । इस प्रकार मैं देवों का संचार कराता हूँ, मैं आदित्य का संचार अनुसरता हूँ। ऐसा कह कर दाहिना हाथ ऊंचा करके दूर्वांकुर प्रदार करे ।।२२।। अथ संवेश्यञ्जायायै हृदयमभिमृशेत् ।। यत्ते सुसीमे हृदये हितमन्तः प्रजापतौ ।। मन्येऽहं मां तद्विद्वांसं माहं पौत्रमघं रुदमिति न हास्मात्पूर्वाः प्रजाः प्रैति ।।२३।। अब अपनी स्त्री को पास बुलाकर, उसके हृदय को स्पर्श करके