भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

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२२ कहे-जो मुझमें तेरे कोमल हृदय में प्रजापति के अर्थ प्रविष्ट हुआ है, उससे कभी नाश न होने वाले आनन्द को प्राप्त हुई, हे सुन्दरी, तुझे पुत्र सम्बन्धी शोक करने का प्रसंग कभी न प्राप्त हो। उसकी सन्तति उसके पहिले कभी नहीं मरेगी ।।२३।। अथ प्रोष्यायन्पुत्रस्य मूर्धानमभिमृशति ं गादंगात् संभवसि हृदयादधिजायसे । आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् ।। असाविति नामास्य गृह्णाति। अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं भव ।।२४।। प्रवास करके वापस आने पर पुत्र का मस्तक सूँघे कहे तू मेरे प्रत्येक अवयव से उत्पन्न हुआ है, तू हृदय से उत्पन्न हुआ है, हे पुत्र सचमुख तू मेरी आत्मा है, सो तू सौ वर्ष पर्यन्त जी।" वह उसका नाम लेकर कहे "तू पत्थर हो, तू परशु हो, सोने का डेला हो ।।२४।। तेजो वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् ।। असाविति नामास्य गृह्णाति । येन प्रजापतिः प्रजाः पर्यगृह्णीतारिष्ट्यै तेन त्वा परिगृह्णाम्यसावित्यथास्य दाक्षेणे कर्णे जपति अस्मै प्रयन्धि मघवन्नृजीषिन्नितीन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहीति सव्ये माच्छिथा मा व्यथिष्ठाः शतं शरद आयुषो जीव पुत्र। ते नाम्ना मूर्धानमभिजिघ्राम्यसाविति त्रिरस्य मूर्धानमभिजिघ्रेद् गवां त्वा हिंकारेणाभिहिंकरोमीति त्रिरस्य मूर्धानमभिहिंकुर्यात् ।।२५।। हे पुत्र, तू सचमुच तेज है सो तू सौ वर्ष तक जी।" उसका नाम लेकर आलिंगन करते हुए वह कहता है- प्रजापति ने प्राणी मात्र का कल्याण के लिये आलिंगन किया, वैसे ही मैं तेरा आलिंगन करता हूँ। पश्चात् पुत्र के दाहिने कान में यह मन्त्र कहे- "अस्मे प्रयन्धि मघवन्नृजीषिन् (ऋ० ३-२६-१०) (हे चपल इन्द्र तू इसको दे)" और