भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 56 में से

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२६ भी वह पड़ा रहा। पश्चात् कर्णेन्द्रिय ने प्रवेश किया परन्तु वाणी से बोलता, नेत्रों से देखता और कर्णों से सुनता हुआ भी वह पड़ा ही रहा। पश्चात् मन ने उसमें प्रवेश किया परन्तु वाणी से बोलता हुआ, नेत्रों से देखता हुआ, कानों से सुनता हुआ और मन से विचार करता हुआ भी वह पड़ा ही रहा। पश्चात् प्राण ने उसमें प्रवेश किया-तत्काल ही वह उठ खड़ा हुआ। तब प्राण का श्रेष्ठत्व स्वीकार करे प्राण ही एक जानने वाला आत्मा है ऐसा जानकर सब देवता प्राणों के साथ उस शरीर से बाहर निकले और वायु में स्थिर होकर और आकाश में लीन होकर स्वर्गलोक में गये। ऐसा जानने वाले मनुष्य को प्राणों का श्रेष्ठत्व विदित होता है और प्राण ही प्रज्ञात्मा है ऐसा वह जानता है और इसी प्रकार वह शरीर से बाहर निकलता है और वायु में स्थिर होकर और आकाश में लय होकर स्वर्गलोक में जाता है।।३२।। यत्रैतद्देवास्तत्प्राप्य तदमृतो भवति यदमृता देवाः ।। ३३ ।। जिस स्थान में वे देवता होते हैं उस स्थान में वह जाता है इस अवस्था को पहुँचने पर यह जानने वाला मनुष्य उन देवताओं को प्राप्त हुए अमरत्व से अमर हो जाता है।।३३।। अथातः पितापुत्रीयं संप्रदानमिति चाचक्षते पिता पुत्रं प्रेष्यान्नह्वयति नवैस्तृणैरगारं संस्तीर्याग्निमुपसमाधायोदकुम्भं सपात्रमुपनिधायाहतेन वाससा संप्रच्छन्नः स्वयं श्येत एत्य पुत्र उपरिष्टादभिनिपद्यत इन्द्रियैरस्येन्द्रियाणि संस्पृश्यापि वास्याभिमुखत एवासीताथास्मै संप्रयच्छति वाचं मे त्वयि दधानीति पिता वाचं ते मयि।।३४।। अब आगे पिता पुत्रीय सम्प्रदान (पिता का पुत्र को देने का उपदेश), कहते हैं-(पिता मरते समय अपने पुत्र को बुलाता है) उसके पहले