भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

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२७ घर में नयी घास बिछाकर, अग्नि सिद्ध करके, उसके पास पात्रों के साथ पानी का घड़ा रखकर श्वेत वस्त्र पहन करके और कोरा कपड़ा ओढ़कर आ बैठता है और पुत्र के ऊपर झुकता है और अपने इन्द्रियों से उसकी इन्द्रियों को स्पर्श करता है अथवा वह उसके आगे बैठकर यह उपदेश करे— "मेरी वाणी तुममें स्थित हो।" पुत्र कहे "तुम्हारी वाणी मैं ग्रहण करता हूँ ।।३४।। दध इति पुत्रः प्राणं में त्वयि दधानीति पिता प्राणं ते मयि दध इति पुत्रश्चक्षु में त्वयि दधानीति पिता चक्षुस्ते मयि दध इति पुत्रः श्रोत्रं में त्वयि दधानीति पिता श्रोत्रं ते मयि दध इति पुत्रो मनो में त्वयि ।।३५।। पिता कहे, "मेरा प्राण तुझमें प्रविष्ट हो।" पुत्र कहे, "तुम्हारा प्राण मैं ग्रहण करता हूँ।" पिता कहे, "मेरे नेत्र तुझमें स्थित हों" पुत्र कहे, "तुम्हारे नेत्र मैं ग्रहण करता हूँ।" पिता कहे, "मेरा कर्ण तुझमें प्रविष्ट हो।" पुत्र कहे "तुम्हारे कर्ण अपने में ग्रहण करता हूँ।" पिता कहे, "मेरा अन्न रस तुझमें स्थित हो।" ।।३५।। दधानीति पिता मनस्ते मयि दध इति पुत्रोऽन्नरसान्मे त्वयि दधानीति पितान्नरसांस्ते मयि दध इति पुत्रः कर्माणि में त्वयि दधनीति पिता कर्माणि ते मयि दध इति ।।३६।। पुत्र कहे, "तुम्हारे अन्न रस को अपने में ग्रहण करता हूँ।" पिता कहे, "मैं अपने कर्म तुझको देता हूँ। पुत्र कहे, "मैं तुम्हारे कर्म अपने में ग्रहण करता हूँ।" पिता कहे, "मैं अपने सुख दुःख तुझमें प्रविष्ट कराता हूँ ।।३६।। पुत्रः सुखदुःखे मे त्वयि दधानीति पिता आनन्दं रतिं प्रजातिं ते मयि दध इति पुत्र इत्यां में त्वयि दधानीति ।।३७।।