भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

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२८ पुत्र कहे, “तुम्हारे सुख दुःख मैं ग्रहण करता हूँ।” पिता कहे “मेरा आनंद, संतोप तुझे प्राप्त हो।” पुत्र कहे, “तुम्हारा आनन्द, सन्तोष और सन्तति अपने में ग्रहण करता हूँ।।३७।। पिता इत्यां ते मयि दध इति पुत्रो धियो विज्ञातव्यं कामान्मे त्वयि दधानीति पिता धियो विज्ञातव्यं कामांस्ते मयि दध इति पुत्रोऽथ दक्षिणावृदुपनिष्क्रामति तं पितानुमन्त्रयते यशोब्रह्मवर्च- समन्नाद्यं कीर्तिस्त्वा जुषतामित्यथेतरः सव्यमसमन्ववेक्षते पाणि- नान्तर्धाय वसनान्तेन वा प्रच्छाद्य स्वर्गांल्लोकान्कामानवाप्नुहीति स यद्यगदः ।।३८ ।। पिता कहे, “मेरा गमन तुझमे होने दे।” पुत्र कहे, “तुम्हारा गमन मैं अपने में कराता हूँ।” पिता कहे “मेरा मन तुझमें रहने दे।” पुत्र कहे, “तुम्हारा मन मैं मुझमें प्रविष्ट कराता हूँ।” पिता कहे, “मेरी प्रज्ञा तुझमें रहने दे।” पुत्र कहे, “तुम्हारी प्रज्ञा को मैं ग्रहण करता हूँ।” यदि वह बहुत बीमार हो तो “मेरे प्राण तुझमें रहने दे” इतना कहे और पुत्र “तुम्हारे प्राण मैं अपने में ग्रहण करता हूँ” ऐसा उत्तर दे। पश्चात् दाहिने नेत्र से पिता को देखते हुए पुत्र पिता को प्रदक्षिणा करते हुए चला जाता है। पिता उसको बुलाकर कहता है “मेरा यश, ब्रह्मवर्चस् और सम्मान तुझे हमेशा प्राप्त हो।” इसके पश्चात् कोई अपने हाथ से अथवा वस्त्र से अपने को ढककर स्कन्ध से पीछे देखे और कहे, स्वर्गलोक तथा सम्पूर्ण इच्छित पदार्थ तुझको प्राप्त हो। इसके पश्चात् यदि पिता अच्छा हो जाय तो वह पुत्र के अधिकार में रहे।।३८।। स्यात्पुत्रस्यैश्वर्ये पिता वसेत्परिव्राव्रजेद्यद्युवै प्रेयाद्यदेवैनं समापयति तथा समापयितव्यो भवति तथा समापयितव्यो भवति।।३६।।