कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३० तृतीयोध्यायः ॐ प्रतर्द्नो ह वै देवोदासिरिन्द्रस्य प्रिय धामोपजगाम युद्धेन पौरुषेण च तं हेन्द्र उवाच प्रतर्दन वरं ते ददानीति से होवाच प्रतर्दनस्त्वमेव मे वृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं मन्यस इति ।।१।। दिवोदास का पुत्र प्रतर्दन युद्ध और पराक्रम से इन्द्र के परम धाम को पहुँचा, उससे इन्द्र ने कहा, “हे प्रतर्दन! मैं तुझे क्या वरदान दूं?” प्रतर्दन ने कहा “आपको जो पसन्द हो जिसको आप मनुष्य के लिये सर्वाधिक हितकारी समझते हों वह वरदान मुझे दीजिये ।।१।। तं हेन्द्र उवाच न वै वरं परस्मै वृणीते त्वमेव वृणीष्वेत्यवरो वै तर्हि किल म इति होवाच प्रतर्दनोऽथो खल्विन्द्रः सत्यादेव नेयाय सत्यं हीन्द्रः स होवाच मामेव विजानीह्येतदेवाहं मनुष्याय हिततमं मन्ये यन्मां विजानीयात् त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रमहनमरुन्मुखान्यतीन्साला- वृकेभ्यः प्रायच्छं बहीः संधा अतिक्रम्य दिवि प्रह्लादीयान- तृणमहमन्तरिक्षे पौलोमान्पृथिव्यां कालखाञ्जान् तस्य मे तत्र न लोम च नामीयते स यो मां विजानीयान्नाय केन च कर्मणा लोको मीयते न मातृवधेन न पितृवधेन न स्तेयेन न भ्रूणहत्यया नास्य पापं च न चकृषो मुखान्नीलं वेतींति ।।२।। इन्द्र बोला “कोई दूसरेको दिया वरदान स्वयं पसन्द नहीं करता, अतः तू अपने लिये आप ही वरदान मांग।” प्रतर्दन बोला “मुझे पसन्द करने के लिये कुछ है ही नहीं।” इन्द्र ने कभी सत्य का त्याग नहीं किया क्योंकि इन्द्र सत्य रूप है। इन्द्र बोला “तू मुझ ही को जान, मनुष्य के लिये मैं यही उत्तम हित मानता हूँ कि यह मुझे पहिचाने।