भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 56 में से

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पृष्ठ 33

३५ त्वष्टा के तीन मस्तक वाले पुत्र को मैंने मार डाला था, वेद से रहित संन्यासियों को मैंने भेड़ियों को दे दिया। अनेक संधियों का अतिक्रमण करके आकाश में प्रह्लाद के वंशजों को मैंने मारा था फिर भी मेरे शिर का एक बाल भी टूटने न पाया। जो मुझको जानता है, (जीवात्मा और परमात्मा के बीच, में जिसको अद्वैत भाव होता है) उसका लोक (सुख) किसी कर्म से, मातृवध से, पितृवध से, चोरे से और भ्रूणहत्या से कभी नष्ट नहीं होता। कभी वह पाप कर्म करने की इच्छा करता है तो भी उसके मुख की कान्ति फीकी नहीं पड़ती'' ।। २ ।। स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा तं मामायुरमृतमित्युपास्वायुः प्राणः प्राणो वा आयुः प्राण एवामृतं यावद्ध्यस्मिञ्छरीरे प्राणो वसति तावदायुः प्राणेन ह्येवामुष्मिल्लोकेऽमृतत्वमाप्नोति प्रज्ञयां सत्यं संकल्पं स यो म आयुरमृतमित्युपास्ते सर्वमायुरस्मिंल्लोक एवाप्नोत्यमृतत्वमक्षितिं स्वर्गे लोके ।। ३ ।। इन्द्र बोला :- “मैं प्राण रूप हूँ। प्रज्ञा रूप, आयुष् और अमृत रूप से मेरी उपासना कर। आयुष् प्राण रूप है, प्राण आयुष् रूप है और प्राण को अमृत से कहा है। जब तक इस शरीर में प्राण रहता है तब तक आयुष्य रहता है मनुष्य प्राण करके इस लोक में अमृतत्व को प्राप्त करते हैं और प्रज्ञा से सत्यसंकल्प को प्राप्त करते हैं। जो आयुष्य रूप और अमृत रूप से मेरी उपासना करता है वह इस लोक में पूर्ण आयुष्य को प्राप्त होता है और स्वर्ग में अमृत भाव को प्राप्त करता है और अक्षयरूप होता है ।। ३ ।। तद्धैक आहुरेकभूयं वै प्राणा गच्छन्तीति न हि कश्चन शक्नुयात्सकृद्वाचा नाम प्रज्ञापयितुं चक्षुषा रूपं श्रोत्रेण शब्दं मनसा ।। ४ ।। तब प्रतर्दन बोला “शास्त्रवित् कहते हैं कि जब कर्मेन्द्रिय और