कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२ ज्ञानेन्द्रिय रूप प्राण एकत्र होकर गमन करते हैं तब वाणी. से नाम जानने को कोई समर्थ नहीं होता। वैसे ही चक्षु रूप को, श्रोत्र शब्द को और मन ध्यान को नहीं जान सकता।।४।। ध्यानमित्येकभूयं वै प्राणा भूत्वा एकैकं सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञापयन्ति वाचं वदन्तीं सर्वे प्राणा अनुवदन्ति चक्षुः पश्यत्सर्वे प्राणा अनुपश्यन्ति ।।५।। जब प्राण एक रूप हो जाता है तब वह भिन्न-भिन्न जानने की शक्ति देता है। इस प्रकार जब वाणी बोलती है तब सब प्राण उसके पीछे बोलते हैं। जब चक्षु देखता है तब उसके पीछे सब प्राण देखते हैं।।५।। श्रोत्रं शृण्वत्सर्वे प्राणा अनुशृण्वन्ति मनो ध्यायत् सर्वे प्राणा अनुध्यायन्ति प्राणं प्राणन्तं सर्वे प्राणा अनुप्राणन्तीत्येवमुहैवैतदिति हेन्द्र उवाचास्तीत्येव प्राणानां निःश्रेयसादानमिति ।।६।। जब श्रोत्र सुनता है तब उसके पीछे सब प्राण सुनते हैं और जब मन विचारता है तब उसके पीछे सब प्राण विचारते हैं। जब प्राण श्वास लेता है तब सब प्राण उसके पीछे श्वास लेते हैं।" इन्द्र बोला :--"इस प्रकार है तो सही, परन्तु उत्कृष्ट सुख तो प्राण को ही होता है।।६।। जीवति वागपेतो मूकान्विपश्यामो जीवति चक्षुरपेतोऽ- न्धान्विपश्यामो जीवति श्रोत्रापेतो बघिरान्विश्यामो जीवति बाहुच्छिन्नो जीवत्यूरुच्छिन्न इत्येवं हि पश्याम ।।७।। हम गूंगे को देखते हैं उससे जान सकते हैं कि वाणी रहित मनुष्य जीता है, अंधे को देखकर जान सकते हैं कि चक्षु रहित मनुष्य जीता हैं. बहरे को देखकर जान सकते हैं कि श्रोत्र रहित जीता है, हाथ से रहित जीता है, तैसे ही उरू कटा हुआ जीता है।।७।। इत्यथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति