कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३ तस्मादेतमेवोक्थमुपासीत यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा ।। ८ ।। इस प्रकार देखते हैं कि प्राण ही प्रज्ञात्मा रूप है, इस शरीर को धारण करके वह इसको उठाता है, इसलिये उसकी उक्थ रूप से उपासना करनी चाहिये। जो प्राण है वह ही प्रज्ञा रूप है, जो प्रज्ञा है सो प्राण रूप है ।। ८ ।। स प्राणः सह ह्येतावस्मिञ्छरीरे वसतः सहोत्क्रामतस्तस्यैषैव दृष्टिरेतद्विज्ञानं यत्रैतत्पुरुषः सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति ।। ६ ।। इस प्राण का स्वरूप इस प्रकार है :-प्राण और प्रज्ञा इस शरीर में साथ रहते हैं, उनमें से दोनों साथ ही उत्क्रमण करते हैं, यह उसकी दृष्टि विज्ञान रूप है। जब पुरुष सुषुप्ति अवस्था में होता है, जब वह कुछ भी स्वप्न नहीं देखता, उस समय प्राण एक ही प्रकार का होता है।। ६ ।। तदैनं वाक् सर्वैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुःसर्वै रूपैः सहाप्येति श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यातैः सहाप्येति स यदा प्रतिबुध्यते ।। १० ।। पीछे वाणी सब नामों सहित उसमें प्रवेश करती है, चक्षु सर्व रूपों सहित उसमें प्रवेश करते हैं, श्रोत्र सब शब्दों सहित उसमें प्रवेश करते हैं और मन सर्व संकल्पों सहित उसमें प्रवेश करता है ।। १० ।। यथाग्नेर्ज्वलतो विस्फुलिंगा · विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकास्तस्यैषैव सिद्धिरेतद्विज्ञानं ।। ११ ।। जब मनुष्य जागरितावस्था में आता है तब जैसे जलते हुए अग्नि में से सब दिशाओं में चिनगारियां उड़ती हैं वैसे ही इस आनन्द रूप