भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

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३५ प्राणेन सर्वान्गन्धानाप्नोति ।।१४।। जब इस शरीर में से प्राण का उत्क्रमण होता है तब शरीर से वाणी सब नामों का त्याग करती है, वाणी की सहायता से सब नामों की प्राप्ति होती है। प्राण सर्व गंधों का त्याग करता है। प्राण की सहायता से सब गंध शरीर को प्राप्त होता है ।।१४।। चक्षुरस्मात्सर्वाणि रूपाण्यभिविसृजते चक्षुषा सर्वाणि रूपाण्याप्नोति श्रोत्रमस्मात्सर्वाञ्छब्दानभिविसृजते श्रोत्रेण सर्वाञ्छब्दानाप्नोति मनोऽस्मात्सर्वाणि ध्यातान्यभिविसृजते मनसा सर्वाणि ध्यातान्याप्नोति सैषा प्राणे सर्वाप्तिः ।।१५।। चक्षु शरीर में से सब रूपों का त्याग करता है, शरीर को चक्षु से सर्व रूपों की प्राप्ति होती है। मन शरीर में से सर्व संकल्पों का त्याग करता है, मनसे उसको सर्व संकल्पों की प्राप्ति होती है। प्राण की विद्यमानता से शरीर को इन सब की प्राप्ति होती है ।।१५।। यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राण स ह्येतावस्मिञ्छरीरे वसतः सहोत्क्रामतोऽथ खलु यथा प्रज्ञायां सर्वाणि भूतान्येकीभवन्ति तद्व्याख्यास्यामः ।।१६।। प्राण प्रज्ञा रूप है सो प्राण है। अब जिस प्रकार प्रज्ञा में सब भूत एक भाव को प्राप्त होता है, उसका वर्णन करते हैं ।१६।। वागेवास्या एकमंगमुदूढं तस्यै नाम परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा घ्राणमेवास्या एकमंगमुदूढं तस्य गन्धः परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा ।।१७।। वाक् देवता ने अपना एक अंश निकाल लिया इससे उसका विषय शब्द भूत मात्रा रूप से बाहर जाता रहा है। जिह्वा ने अपना एक अंश निकाल लिया इसके उसका विषय रस भूत मात्रा रूप से बाहर जाता