भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

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३६ रहा। हाथ ने एक अंश निकाल लिया इससे उसका विषय सुख और दुःख मात्रा रूप से बाहर जाता रहा ।। १७ ।। चक्षुरेवास्या एकमंगमुदूढं तस्य रूपं परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्र श्रोत्रमेवास्या एकमंगमुदूढं तस्य शब्दः परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा जिह्वैवास्या एकमंगमुदूढं तस्या अन्नरसः परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा हस्तावेवास्या ।। १८ ।। चक्षु, श्रोत्र, जिह्वा और हाथ ने अपने-अपने अंश निकाले और उनके विषय रूप, शब्द, अन्नरस और कर्म भूतमात्रा रूप से बाहर जाते रहे ।। १८ ।। एकमंगमुदूढं -तयोः कर्म परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा शरीरमेवास्या एकमंगमुदूढं तस्य सुखदुःखे परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा उपस्थ एवास्या एकमंगमुंदूढं तस्यानन्दो रतिः प्रजातिः परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा पादौवेवास्या एकमंगुदूढं तयोरित्या परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा प्रज्ञैवास्या एकमंगमुदूढं तस्यै धियो विज्ञातव्यं कामाः परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा ।। १९ ।। उपस्थेन्द्रिय ने अपना एक अंश निकाल लिया इससे उसका विषय आनन्द रति और प्रजोत्पत्ति भूत मात्रा रूप से बाहर जाता रहा। पादों ने अपना एक अंश निकाल लिया इससे उनका विषय गति भूत मात्रा रूप से बाहर जाती रही। प्रज्ञा ने अपना एक अंश निकाल लिया इससे उसका विषय बुद्धि, ज्ञान और काम भूत तन्मात्रा रूप से बाहर जाता रहा ।। १९ ।। प्रज्ञया वाचं समारुह्य वाचा सर्वाणि सामान्याप्नोति प्रज्ञया प्राणं समारुह्य प्राणेन सर्वान्गन्धानाप्नोति प्रज्ञया चक्षुः समारुह्य चक्षुषा सर्वाणि ।। २० ।।