भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 56 में से

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४० को आनन्द, रति और प्रजोत्पत्ति के ज्ञाता को जानना चाहिये ।।२७ ।। विजिज्ञासीतानन्दस्य रतेः प्रजातेर्विज्ञातारं विद्यान्नेत्यां विजिज्ञासीतैतारं विद्यान्न मनो विजिज्ञासीत मन्तारं विद्यात्ता वा एता दशैव भूतमात्रा ।।२८ ।। मनुष्य गति को जानने की इच्छा न करे, गमन करने वाले को जानना चाहिये । मनुष्य को मन को न जानना चाहिये, मनने करने वाले को जानना चाहिये । सच ही ये दश भूत मात्रायें प्रज्ञा की अधिष्ठित हैं ।।२८ ।। अधिप्रज्ञं दश प्रज्ञामात्रा अधिभूतं यद्धि भूतमात्रा न स्युर्न प्रज्ञामात्राः स्युर्यद्वा प्रज्ञामात्रा न स्युर्न भूतमात्राः स्युः ।।२६ ।। और प्रज्ञा की दश मात्रायें भूतों के अधिष्ठित हैं। जो भूत मात्रायें न हों तो प्रज्ञा मात्रायें न होनी चाहिये और जहां प्रज्ञा तन्मात्रायें न हों वहां भूत मात्रायें भी न चाहिये ।।२६ ।। न ह्यन्यतरतो रूपं किंचन सिद्ध्येन्नो एतन्नाना तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पिता नाभावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणे अर्पिता एष प्राण एव प्रज्ञात्मानन्दोऽजरोऽमृतो न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कर्मणा कनीयानेष ह्येवैनं साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष उ एवैनमसाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते । एष लोकपाल एष लोकाधिपतिरेष सर्वेश्वरः स म आत्मति विद्यात्स म आत्मेति विद्यात् ।।३० ।। इन दोनों में से एक करके किसी रूप की भी सिद्धि नहीं होती । इस एकता का कभी विभाग नहीं होता । जैसे रथ के चक्र के आरे में नेमि रहती है और नेमि में आरे रहते हैं इसी प्रकार भूत मात्रायें

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