भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 56 में से

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पृष्ठ 43

४१ प्रज्ञा मात्रायें प्राणों में अर्पित हैं। यह प्राण ठीक प्रज्ञा रूप है, व आनन्द रूप है, वह अजर और अमृत रूप हैं वह शुभ कर्मों से महान् नहीं होता और अशुभ कर्मों से छोटा नहीं होता। यह प्रज्ञा ठीक-ठीक जिस मनुष्य को इस लोक में से उच्च से उच्च गति को पहुंचाने की इच्छा करती है उससे शुभ कर्म कराती है। और इस लोक से जिस मनुष्य को नीच गति में पहुँचाने की इच्छा करती है उससे अशुभ कर्म कराती है। वह लोकों का पति रूप है, वह लोकों का अधिपति रूप है। यह प्रज्ञा सर्वेश्वर रूप हैं वह मेरा आत्मरूप है ऐसा जाने, मेरा आत्म रूप है ऐसा जाने।।३०।।