भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 56 में से

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४२ चतुर्थोऽध्यायः अथ गार्ग्यो ह वै बालकिरनूचानः संस्पष्ट आस सोऽयमुशीनरेषु संवसन्मत्स्येषु कुरुपञ्चालेषु काशीविदेहेष्विति स हाजातशत्रुं ।।१।। गार्ग्य गोत्र में बालाकि नामक एक प्रसिद्ध विद्वान् हुआ। वह उशीनर में, मत्स्य देश में, कुरुपांचाल तथा काशी विदेह देश में रहा हुआ था। वह काशी के राजा अजातशत्रु के पास जाकर उससे बोला, “मैं तुझे ब्रह्म का वर्णन करता हूँ।” ।।१।। काश्यमेत्योवाच ब्रह्म ते ब्रवाणीति तं होवाचाजातशत्रुः सहस्रं दद्मस्त एतस्यां वाचि जनको जनक इति वा उ जना धावन्तीति ।। २ ।। अजात शत्रु उससे बोला “इस बात के लिये मैं तुझे एक सहस्र (गायें) देता हूँ, क्योंकि लोग जनक ही को ब्रह्म विद्या का श्रोता समझते हैं इसलिये उसी के पास लोग (ब्रह्मविद्या के वक्ता) जाया करते हैं। ।२ ।। स होवाच बालाकिर्य एवैष आदित्ये पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठा बृहन्पाण्डरवासा अतिष्ठाः ।। ३ ।। बालाकि बोला, “आदित्य में जो पुरुष है, उसीकी मैं (ब्रह्मरूप से) उपासना करता हूँ।” आजतशत्रु ने कहा, “इस विषय में तू मुझसे संवाद मत कर। जो बड़ा है, शुभ्र वस्त्र परिधान करता है ।।३।। सर्वेषां भूतानां मूर्धेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा भवति ।।४ ।। तथा जो सब भूतों में श्रेष्ठ और उसका राजा है, उसकी मैं उपासना

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