कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४ मुझे स्थापित करेगा?” श्वेतकेतु ने कहा “यह मैं कुछ नहीं जानता, इसके विषय में आचार्य से पूछूंगा। ।३।। स ह पितरमासाद्य पप्रच्छेतीति मा प्राक्षत्कथं प्रतिब्रवाणीति स होवाचाहमप्येतन्न वेद सदस्येव वयं स्वाध्यायमध्येत्य हरामहे ।।४।। यह (श्वेतकेतु) अपने पिता के पास लौट गया और बोला “चित्र ने मुझसे इस प्रकार पूछा है, मैं इसका क्या उत्तर दूं?” उसके पिता ने कहा “मैं भी यह नहीं जानता, चल हम उसके घर पर चलें, वहां वेदाध्ययन करके उससे ज्ञान प्राप्त करें। ।४।। यन्नः परे ददत्येह्युभौ गमिष्याव इति ।। स ह समित्पाणिश्चित्रं गार्ग्यायणिं प्रतिचक्रम उपायानीति तं होवाच ब्रह्मार्होऽसि गौतम यो मामुपागा एहि त्वा ज्ञपयिष्यामीतिं । स होवाच ये वैके चास्माल्लोकात्प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति तेषां प्राणैः पूर्वपक्ष आप्यायतेऽथापरपक्षे न प्रजनयत्येतद्वै स्वर्गस्य लोकस्य द्वारं यश्चन्द्रमास्तं यत्प्रत्याह तमतिसृजते य एनं प्रत्याह तमिह वृष्टिर्भूत्वा वर्षति ।।५।। क्योंकि जब अन्य अपने को देता तो प्राप्ति के लिये दोनों चलें । (ज्ञानप्राप्ति में संकोच नहीं करना चाहिये।)” अनन्तर हाथ में समिधा लेकर वह गार्ग्य के पुत्र चित्र के पास गया और कहा ‘मैं आप से ज्ञान प्राप्त करने आया हूँ’ तब चित्र ने कहा “गौतम ! तू ब्रह्मविद्या प्राप्त करने योग्य है (क्योंकि तुझमें अहंकार नहीं है) ‘तू मेरे पास आ, मैं तुझे ब्रह्मविद्या का उपदेश करूंगा। चित्र बोला—“जो कोई इस लोक में से जाते हैं वे सब चन्द्रलोक में जाते हैं। शुक्ल पक्ष में चन्द्र उन लोगों के प्राणों से पुष्ट होता है परन्तु कृष्ण पक्ष में उनको फिर उत्पन्न नहीं करता। सचमुच चन्द्र स्वर्ग का द्वार है, जिसको इस चन्द्रलोक