भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

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५ की इच्छा नहीं होती उसको वह ऊर्ध्व लोक में भेजता है, परंतु जिसको चन्द्रलोक की इच्छा होती है उसको वह वृष्टि रूप से इस लोक में भेजता है।।५।। स इह कीटो वा पतंगो वा शकुनिर्वा शार्दूलो वा सिंहो वा मत्स्यो वा परश्वा वा पुरुषो वान्ये वैतेषु स्थानेषु प्रत्यांजायते यथाकर्म यथाविद्यं ।।६।। वहां वह कीट, पतंग, पक्षी, वाघ, सिंह, मत्स्य, रीक्ष, मनुष्य अथवा कोई अन्य स्थानों में प्राणी रूप से अपने कर्म और विद्या के अनुसार धारण करता है।।६।। तमागतं पृच्छति कोऽसीति तं प्रतिब्रूयाद्विचक्षणादृतवोरेत आभृतं पञ्चदशात्प्रसूतात्पित्र्यावतः।।७।। जब वह जन्म लेता है तब गुरु उसको पूछता है "तू कौन?" तब इसका उत्तर नीचे के समान देना चाहिये "विचक्षण और ऋतु के अधिष्ठाता ऐसे चन्द्र में से रेत् एकत्र हुआ था यह चन्द्र शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष को उत्पन्न करता है, वह पितरों का स्थान रूप है।।७।। तन्मा पुंसि कर्तर्येरयध्वं पुंसा कर्त्रा मातरि मासिसिक्तः स जायमान उपजायमानो द्वादश त्रयोदश उपमासा।।८।। उस चन्द्र की उत्पत्ति नित्य के हवि में से होती है। रेत रूप मुझको देवताओं ने मनुष्य में रखा। मनुष्य को निमित्त करके देवताओं ने मुझे स्त्री में रखा। उस में से मैं बारह अथवा तेरह मास रूप से अथवा जीवित रूप ये मनुष्य जन्म को प्राप्त हुआ था।।८।। द्वादशत्रयोदशेन पित्रा संतद्विदेहं प्रतितद्विदेहं तन्म ऋतवो मर्त्यव आरभध्वं ।।६।। सत्य असत्य का ज्ञान जानने के निमित्त बारह अथवा तेरह मास