कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६ रूप पिता के साथ जुड़ा था, हे देवताओं! मुझे जीवित योग्य समय तक रहने दो कि जिससे अमृतता को प्राप्त होऊं।।६।। तेन सत्येन : तपसर्तुरस्म्यार्तवोऽस्मि कोऽसि त्वमस्मीति तमतिसृजते ।।१०।। अपने सत्य से - मेहनत और सहनशीलता से मैं काल रूप हूँ, मैं कालके अधीन हूँ, तुम कौन हो?" तब वह कहता “मैं भी तेरे समान हूँ!” पश्चात् वह उसको आगे जाने देता है ।।१०।। स एतं देवयानं पन्थानमासाद्याग्निलोकमागच्छति स वायुलोकं स वरुणलोकं स आदित्यलोकं स इन्द्रलोकं स प्रजापतिलोकं स ब्रह्मलोकं तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मलोकस्यारोहदो मुहूर्ता येष्टिहा विरजा नदी इल्यो वृक्षः सालुज्यं संस्थानमपराजितमानयतन- मिन्द्रप्रजापती द्वारगोपौ विभुं प्रमितं विचक्षणासंध्यमितौजाः पर्यङ्कः प्रिया च मानसी प्रतिरूपा च चाक्षुषी पुष्पाण्यादायावयतौ वै च जगत्यम्बाश्चाप्सरसोऽम्बपा नद्यस्तमित्थंविदा गच्छति ।।११।। देवयान मार्ग को प्राप्त होकर वह अग्निलोक की तरफ जाता है, उस स्थान से वायु लोक में जाता है। वहाँ से वरुण लोक में, वहां से आदित्य लोक में, वहां से इन्द्र लोक में, वहां से प्रजापतिलोक में और वहां से ब्रह्मलोक में जाता है। ब्रह्मलोक में अर नामका सरोवर, इष्टिह नाम का समय, विरजा नामकी नदी इल्य नामका वृक्ष, सालज्य नामका नगर, अपराजित नामका प्रासाद, इन्द्र (वायु) और प्रजापति (आकाश) द्वारपाल रूप से हैं। ब्रह्म का विभु नामक सुसज्जित कमरा है, विचक्षणा (बुद्धि) उसकी गद्दी है। उत्कृष्ट तेज वाला उसका पलंग है, मानसी नाम की प्रिया, चाक्षुषी नाम का प्रतिबिम्ब है जो पुष्पों के समान जगत् को बुनता है सबकी माता (श्रुति) रूप और अक्षर (श्रुति