कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । बुध्नेन नवनीतान्वक्तेन त्रिः प्रतीहारं तालुनि तापयति ॥ २२ ॥ शिग्रुभिर्नवनीतमिश्रैः प्रदेग्धि ॥ २३ ॥ एक- विंशतिमुशीराणि भिनत्तीति मन्त्रोक्तम् ॥ २४ ॥ उशी- राणि प्रयच्छति ॥२५॥ एकविंशत्या सहाप्लावयति ॥२६॥ आ यं विशन्तीति वधोनिवेशनशृतं क्षीरौदनमश्नाति ॥२७॥ परिद्यामिवेति मधु शीभं पाययति ॥२८॥ जपँश्च ॥ २६ ॥ अस्थिस्रंसमिति शकलेनाप्स्वटे सम्पातवता- वसिञ्चति ॥३०॥५॥२६॥ आवयो इति सार्षपं तैलसम्पातं बध्नाति ॥ १ ॥ काण्डं प्रलिप्य ॥२॥ पृक्तं शाकं प्रयच्छति ॥३॥ चत्वारि कर अग्नि में तपा कर गाँव की धूलि को सूक्त पढ़कर बखेर देवे ॥२०॥२१॥ पुनः अग्नि के पश्चिम भाग में माता के गोद में कुमार को बैठाकर करीर मूल के साथ नवनीत मिलाकर तीन बार ले २ कर कुमार के तालु में तपावे ॥ २२ ॥ शोहजन वृक्ष के जड़ की रस को या जड़ को नवनीत मिलाकर । “ओते म०” से अभिमंत्रण करके फेंके ॥ २३ ॥ खस के २१ जड़ को अभिमंत्रण करके पत्थर से चूर्ण करके सूक्त को जप कर अग्नि में जलावे । तब कृमियों को देवे ॥ २५ ॥ और २१ खस की पिञ्जुली सहित को अभिमंत्रण कर रोगी को नहवावे ॥ २६ ॥ राक्षस गृहीत की दवा को कहते हैं । “आ यं विशन्ति०” सूक्त से पक्षी के घोसले को जला कर क्षीरौदन पका कर खावे ॥२७॥ “परिद्यामिव० सूक्त से मधु और शीर रोगी को पिलावे और सूक्त का जप करे ॥२८॥ ॥२९॥ “अस्थिस्रंस०” सूक्त से शान्त वृक्ष के शकल को लाकर जल में डालकर अग्नि जलाकर जल को गर्म कर सर्प दष्ट पुरुष को सिंचन करे यह साँप की दवा है ॥३०॥ यह उन्तीसवी कण्डिका पूरी हुई ॥२९॥५॥ अब नेत्र की बीमारी की दवा को कहते हैं । “आवयो०” सूक्त से सर्षप काण्डमणि को लाकर अभिमंत्रण करके सर्षप के तेल से सम्पात वंत करके आज्य द्वारा आधान होम करके अङ्गों को सर्षप तैल से मल- कर मणि को बान्धे ॥ १ ॥ २ ॥ और सर्षप के शाकको उसके तेल से अभ्यक्त और अभिमंत्रण करके रोगी को खाने को देवे ॥ ३ ॥ चार शाक