भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 361 में से

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पृष्ठ 105

तायाः स्वयंस्रस्तेन गोशृङ्गेण सम्पातवता जपन् ॥ ६ ॥ यां ते रुद्र इति शूलिने शूलम् ॥ ७ ॥ उत्सूर्य इति शमीबिम्बशीर्णपर्ण्यावधि ॥ ८ ॥ द्यौश्च म इत्यभ्यज्या- वमार्ष्टि ॥ ९ ॥ स्थूणायां निकर्षति ॥ १० ॥ इदमित्था इत्यक्षतं मूत्रफेनेनाभ्युद्य ॥ ११ ॥ प्रक्षिपति ॥ १२ ॥ प्रक्षालयति ॥ १३ ॥ दन्तरजसावेदग्धि ॥ १४ ॥ स्त- म्बरजसा ॥ १५ ॥ अपचित आ सुस्रस इति किंस्यूता- कर पिलावे ॥ ५ ॥ बहुत बोलना, अधम में प्रवृत्त होना अपवाद कह- लाता है। इसका भैषज्य। अभ्यातानान्त तक क्रिया करके जिस गौ का बच्चा अपनी मा का दूध पीना छोड़ दिया हो ऐसी गौ का सींग अपने आप टूट जाने पर उस सींग को लेकर उसमें जल डालकर अभि- मंत्रण करके अभ्युक्षण करके "अस्थाद् द्यौः" मन्त्र से आचमन करावे ॥ ६ ॥ पेट, हृदय, या किसी अङ्ग या सब अङ्गों में शूल पैदा होने की दवा को कहते हैं॥ "यान्ते रुद्र०" इस सूक्त से शूलमणि को लाकर अभिमंत्रण कर बान्धे। लोहमणि या पाषाणमणि एक ही पदार्थ है ॥७॥ अब रक्षोग्रह की दवा को कहते हैं। "उत्सूर्य०" से चिति आदि ओषधियों द्वारा जल भरे घड़े को अभिमंत्रण करके रोगी को अवसिंचन करे। शमी जल से अवसिंचन करे। शमी बिम्ब जल सहित से अव- सिंचन करे। शीर्णपर्णी जल से अवसिंचन करे ॥ ८ ॥ अब दुष्टगण्ड विशिष्ट की दवा को कहते हैं॥ "द्यौश्च म०" मंत्र से तेल को अभिमंत्रण करके रोगी को सम्मार्जन करे ॥ ९ ॥ और घी से अरिष्ट को अभ्यक्त करके जखम को घीसकर स्थूणा से पीव निकाले ॥ १० ॥ अब अक्षत व्रण की दवा को कहते हैं। गोमूत्र या मनुष्यमूत्रके फेन को “इदमित्था०" से अभिमंत्रण करके जखम को मर्द्दन करे (जिस घाव में पीव बहने का मुँह न हो ) और मूत्र को फेककर हाथ धो लेवे ॥ १२॥ १३॥ जखम को दाँत के मल से सब ओर से लेप करे (जिस दुष्ट गण्डमाल घाव का रुधिर न बहे) और तृण के लगे धूलि को अभिमंत्रण कर लेप करे ॥ १४ ॥ १५ ॥ गण्डमाला की दवा को कहते हैं। शंख को घीसकर "अपचित०" से अभिमंत्रण करके गण्डमाला पर लेप करे। या कुत्ते १०

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