कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । दीनि ॥१६॥ लोहितलवणं संक्षुद्याभिनिष्ठीवति ॥१७॥ अन्तरिक्षेणेति पक्षहतं मन्त्रोक्तं चङ्क्रमया ॥१८॥ कीटेन धूपयति ॥१९॥ ग्लौरित्यक्षतेन ॥२०॥ वीहि स्वामित्य- ज्ञातारुः शान्त्युदकेन सम्प्रोक्ष्य मनसा सम्पातवता ॥ २१ ॥ या ओषधय इति मन्त्रोक्तस्यौषधीभिर्धूपयति ॥२२॥ मधूदश्वित्पाययति ॥२३॥ क्षीरोदश्वित् ॥२४॥ उभयं च ॥२५॥ देवा अदुरिति वल्मीकेन बन्धनपायना- चमनप्रदेहनमुष्णेन ॥ २६ ॥ यथा मनोऽव दिव इत्यरि- के लार का लेप करे । जोंक को अभिमंत्रण करके गण्डमाला में लगा देवे । या गृहगोधिका को अभिमंत्रण के गण्डमाला में लगा देवे ॥१६॥ सैंधव नून को चूर्ण करके अभिमंत्रण कर गण्डमाला पर छींटे और उस पर थूक देवे एवं मुख के लार को उस पर डाल देवे ॥ १७ ॥ पक्षी के काटने से जखम होने पर उसकी दवा को कहते हैं । “अन्तरिक्षेण०” से कुत्ते के पैर के नीचे की मट्टी को अभिमंत्रण करके काटे जखम पर लेप करे ॥१८॥ कुत्ते के शरीर पर के कीट को अभिमंत्रण करके उसे अग्नि में डालकर धूप देवे ॥ १९ ॥ “ग्लौरितः प्रपतिष्यति०” इस आधी ऋचा से गोमूत्र को अभिमंत्रण करके गण्डमाला को मर्दन करे प्रक्षालन करे और दाँत के मल से प्रलेप करे और तृणरज का लेप करे ॥ २० ॥ अब गदहे आदि के ऊरुगण्ड की दवा को कहते हैं । “वीहि स्वां०” मंत्र से शान्तिजल को अभिमंत्रण करके जखम को प्रोक्षण करे । आज्य की आहुति देवे । तब मन से संकल्प करे और सम्पातों को देवे ॥२१॥ पाप- गृहीत जलोदर की दवा को कहते हैं । “या ओषधय०” से दूधवाली दवा- ओं का धूप देवे । और आधा पानी महा हुआ तक्र रोगी को पिलावे । दूध, और उदश्वित् रोगी को पिलावे ॥२२॥२३॥२४॥ दोनों ही को पिलावे ॥ २५ ॥ विष, उपविष, स्थावरविष, जङ्गमविष, मधुमक्षिकाविष, इनकी दवा को कहते हैं । “देवा अदुः” सूक्त द्वारा दीमक की मट्टी को बान्धे, पिलावे, आचमन करावे, एवं उसको गरम करके रोगी को लेप करे ॥२६॥ कास और कफ गिरने की दवा को कहते हैं । “यथा मनोऽव दिव०” से अरिष्ट गृहीत व्यक्ति को भोजन को अभिमंत्रण करके देवे । सत्तु