भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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ष्टेन ॥२७॥ देवी देव्यां यां जमदग्निरिति मन्त्रोक्तफलं जीव्यलाकाभ्याममावास्यायां कृष्णवसनः कृष्णभक्षः पुरा काकसम्पातादवनक्षत्रेऽवसिञ्चति ॥२८॥७॥३१॥ यस्ते स्तन इति जम्भगृहीताय स्तनं प्रयच्छति ॥१॥ प्रियङ्गुतण्डुलानभ्यवदुग्धान्पाययति ॥२॥ अग्ना- विष्णू सोमारुद्रा सिनीवालि वि ते मुञ्चामि शुम्भनी इति मौञ्जैः पर्वसु बद्धा पिञ्जलीभिराप्लावयति ॥३॥ अवसि- ञ्चति ॥४॥ तिरश्चिराजेरिति मन्त्रोक्तम् ॥५॥ आकृतिलोष्ट- वल्मीकौ परिलिख्य ॥६॥ पायनानि ॥७॥ अपचिता-


के मंथ को अभिमंत्रण करके देवे । एवं सूर्य का उपस्थान करे और अभि- मंत्रित जल से आचमन करावे ॥ २७ ॥ “देवी देव्यां०” मंत्रोक्त फल काचीमाची फलमणिको भृङ्गराजमणि को बान्धे । जीवन्ती फलको बांधे । भृङ्गराज को बान्धे । केशों को दृढ़ करने, केशों के उत्पन्न होने, छोटे केशों के बढ़ने की दवा कही गयी है । माष ( उड़ीद ) तिलादि काले अन्न को खिलाकर काची माची फल को भृङ्गराज के द्वारा जल के साथ अभिमंत्रण करके रात्रि में ब्राह्ममुहूर्त्त में अवसिंचन करे ॥२८॥ ७ ॥ ३१ ॥ यह इकतीसवीं कण्डिका पूरी हुई ॥ जिस शिशु को जम्भु आदि पकड़ लिया हो उसकी माता के स्तनों को “यस्ते स्तन०” मंत्र से अभिमंत्रण करके बच्चे के मुखमें लगा देवे ॥ १ ॥ इस क्रिया को उसका पति करे ॥ दुःखनाशके भैषज्य को कहते हैं मालकौनी के चावलों को, बच्चे की मां या बाप बालक को पिलावे, तब उसे दूध पिलावे ॥ २ ॥ “अग्नाविष्णू०” इत्यादि से मूँज को गांठों में बांध कर उसकी पिंजुलियों से बच्चे को नहवावे या सिंचन कर ॥ ३ ॥ बिच्छु काटने की दवा । “तिरश्चिराज०” इन आठ ऋचाओं से जेठी- मधु को पीस कर अभिमंत्रण करके बिच्छु काटे व्यक्ति को पिलावे ॥ ४ ॥ ५ ॥ खेत की मट्टी को जीव कोषणी के चमड़े में लपेट,करके मणि बना करके भूमि पर धरकर अभिमंत्रण करके रोगी को बान्ध देवे ॥ ६ ॥ विषदूषण में जो उपायन ओषधियां कही गईं हैं, वे “तिरश्चि- राज०” सूक्त पठित जानो । बिच्छू, मशक, पिपीलिका, शार्कोटक,