कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ८१ कृष्णं व्रजति ॥६॥ आदीप्य ब्रह्मा ॥७॥ एवं पूर्वयोः पृथक् संभार्ये ॥८॥ शाखासूक्तम् ॥९॥ पश्चादग्नेरभितः काण्डे इषीके निधायाध्यधि धायिने औदुम्बरीराधापयति ॥१०॥ उत्तमाव्रजितायै ॥११॥ पतिवेदनानि ॥१२॥ आ नो अग्न इत्यागमकृशरमाशयति ॥१३॥ मृगाखराद्वेद्यां मन्त्रो- क्तानि सम्पातवन्ति द्वारे प्रच्छति ॥१४॥ उदकंसे व्रीहियवौ जाम्यै निशि हुत्वा दक्षिणेन प्रक्रामति ॥१५॥ पश्चादग्नेः प्रक्षाल्य संधाव्य सम्पातवतीं भगस्य नाव- मिति मन्त्रोक्तम् ॥१६॥ सप्तदाम्यां सम्पातवत्यां वत्सान् प्रह्यन्तान्प्रनृत्तन्तो वहन्ति ॥१७॥ अहतेन सम्पातवता ऋषभमभ्यस्यति ॥ १८ ॥ उदर्दयति यां दिशम् ॥१९॥ पश्चिम में कर्म किया है उसी प्रकार पूर्व के दोनों घरों में कर्म होना चाहिये । इस सूक्त के शिंशापादि की शाखाओं में उदक तक कर्म होता है। समिदाधानाग्नि के पश्चिम भाग में काष्ठ द्वारा इषीका डालकर उसपर उदुम्बर की लकड़ी धरे—तोरण के आकार का आधान करे । पुरोडाश, प्रमन्द, अलंकार को धर कर देवे ॥४॥५॥६॥७॥८॥९॥१०॥११ अब पति लाभ फल कर्मों को कहते हैं ॥१२॥ "आनो अग्न०" से तिल चावल का भात बना कर स्त्री को खिलावे ॥१३॥ मृगाओं से नित्य सेवित देश को "मृगाखर" कहते हैं । वहां से मिट्टी लाकर वेदि बनावे । इसमें सम्पात करके आखर, सोना, गुग्गुल, गजोदक जामिक मातृका इसका कर्म है । यथोक्त सम्पादन कर बन्धन, धूपन प्रलेपन करे । उस घर के दक्षिण भाग में बहिन एवं भ्राता कुमारी को अपक्रमण करावे ॥१४॥१५ अग्नि के पश्चिम भाग में नाव को प्रक्षालन कर सम्पातवती करके कुमारी को नाव पर चढ़ावे "भगस्य नावम्०" मंत्र जप कर नाव से कुमारी को उतारे ॥१६॥ और सप्तदान तंत्री से वत्सों को बांध करके धर कर अभिमंत्रण कर कुमारी से छुड़वावे । यदि कुमारी से प्रदक्षिण पूर्वक छोड़वाई जावे तो पति लाभ होगा। और नये वस्त्र पहनकर वृषभ को छोड़े ॥१७॥१८॥ वृषभ जिस ओर को जावे उसी ११