कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । जाम्यै प्र यदेत इत्यागमकृशरम् ॥२०॥ इमा ब्रह्मेति स्वस्रे ॥२१॥ अयमा यातीति पुरा काकसम्पातादर्यम्णे जुहोति ॥२२॥ अन्तःस्रक्तिषु बलीन् हरन्ति ॥२३॥ आपतन्ति यतः ॥२४॥१०॥३४॥ पुंसवनानि ॥१॥ रजउदासायाः पुंनक्षत्रे ॥२॥ येन वेहदिति बाणं मूर्ध्नि विवृहति बध्नाति ॥३॥ फालचमसे सरूपवत्साया दुग्धे व्रीहियवाववधाय मूर्च्छयित्वाध्य- ण्डे बृहतीपलाशविदर्यौ वा प्रतिनीय पैद्वमिव ॥४॥ पर्व- ताद्दिव इत्यागमकृशरमाशयति ॥५॥ युगतर्द्धना सम्पा- तवन्तं द्वितीयम् ॥६॥ खे लूनींश्च पलाशत्स्रुन्निवृत्ते ओर को जाने देवे ॥१९॥ “जाम्यै प्र यदेत०” से भाई बहिन दोनों को और “इमा ब्रह्म०” से बहिन को आगम कृशर खिलावे ॥२०॥२१॥ प्रातः काल “अर्यम्णे०” से सूर्य्य को आहुति देवे । ॥२२॥ इसके अनन्तर ‘अर्यम्णे०” आधी ऋचा से घर के भीतर कोणों में बलि देवे । जिस दिशा से प्रातःकाल काकों का आगमन हो, उसी दिशा से पति लाभ जानो ॥२४॥१०॥३४॥ यह चौतीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥३४॥ अब पुंसवन संस्कार को कहते हैं । यह संस्कार गर्भ से पञ्चम मास में होता है ॥१॥ रजोधर्म से शुद्ध हुई स्त्री को स्नान कर लेने पर पुंनामक नक्षत्र में “येन वेहत्०” मंत्र से शरमणि को लाकर अभि- मंत्रण करके स्त्री के गले में बांधे ॥२॥३॥ फाल के बने चमसे में सरूप- वत्सा गौ के दूध में व्रीहि और यव को डालकर मूर्छन करके या अध्य- ण्डमें बृहती, पलाश और विदारी को डालकर पैद्व (बूटी) की भाँति स्त्री के पति नाक के दहिने छिद्र में दहिने हाथ के अंगूठे से नस्य देवे ॥४॥ रजोधर्म के पश्चात् चौथे दिन “पर्वताद्दिव०” सूक्त से आज्य की आहुति करे । भात में तिल मिश्र आगम कृशर को गर्भिणी को खिलावे और इसी सूक्त से दूसरे कृश्न आगम कृशर को गाड़ी के युग छिद्र में डाल कर गर्भिणी को खिलावे । ‘पुष्पवतीः’० मंत्र से ॥५॥६॥ पलाश काष्ठ की बनी तलवार की मूठ ( त्सरु ) । टूटी हुई पलाश त्सरु निवृत्त पर