भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 361 में से

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निधृष्याधाय शिश्ने ग्रामं प्रविशति ॥७॥ शमीमश्वत्थ इति मन्त्रोक्तेऽग्निं मथित्वा पुंस्याः सर्पिषि पैद्वमिच ॥८॥ मधु- मन्थे पाययति ॥९॥ कृष्णोर्णाभिः परिवेष्ट्य बध्नाति ॥१०॥ यन्तासीति मन्त्रोक्तं बध्नाति ॥११॥ ऋधद्ध्यान्त्र इत्येका यथेयं पृथिव्यच्युतेति गर्भदृंहणानि ॥१२॥ जम्भगृही- ताय प्रथमावर्जं ज्यां त्रिरुद्रथ्य बध्नाति ॥१३॥ लोष्टा- नन्वृचं प्राशयति ॥१४॥ श्यामसिकताभिः शयनं परिकि- रति ॥१५॥ यामिच्छेद्धीरं जनयेदिति धातव्याभिरुद- रमभिमन्त्रयते ॥१६॥ प्रजापतिरिति प्रजाकामाद्या उपस्थे जुहोति ॥१७॥ लोहिताजापिशितान्याशयति ॥ १८ ॥ वपान्तानि ॥१९॥ यौ ते मातेति मन्त्रोक्तौ बध्नाति ॥२०॥

घिस कर शिश्न पर डालकर मैथुन करे ॥७॥ शमी वृक्ष के भीतर के अश्वत्थ वृक्ष के काष्ठ से मथकर निकले हुए अग्नि में घृत (जिस गौ का बच्चा पुरुष हो उसके घृत से) डाल कर स्त्री को उसकी नाक के दहिने छिद्र में दहिने अंगूठे से नस्य देवे । पैद्व की भाँति ॥८॥ मधुमन्थ में अग्नि डाल कर अभि- मंत्रण कर स्त्री को पिलवावे ॥९॥ शमीगर्भाश्वत्थोत्पन्न अग्नि को काले भेड़ के ऊन से लपेट कर बांधे आज्य की क्रिया करे ॥१०॥ ‘यन्ता सि०’ मंत्र से हाथ से लेकर कर्णादि को सम्पातनकर अभिमंत्रण करे । आज्य तन्त्र करके गर्भिणी को बांधे ॥११॥ यह गर्भाधान हुआ । “ऋधङ् मंत्र०” और “यथेयं पृथिवी०” इत्यादि सूक्तों से गर्भवर्धन कर्म करे ॥१२॥ जम्भ गृहीत स्त्री को ताँत को तीन गुणा करके बांधे ॥१३॥ और मट्टी के ढेलों को प्रत्येक ऋचा से अभिमंत्रित कर गर्भिणी को प्राशन करावे ॥१४॥ श्यामा और सिकता को गर्भिणी कै शयन स्थान के सब ओर फेके ॥१५॥ और “धाता दधातु०” इत्यादि चार ऋचा से गर्भिणी के उदर को अभिमंत्रण करे ॥१६॥ यह वीर कर्म हुआ । “प्रजापतिः०” सूक्त से प्रजा की कामना वाला गर्भिणी के उपस्थ के पास आहुति करे ॥१७॥ लाल बकरी के मांस को गर्भिणी को खिलावे ॥ १८ ॥ उदकुलिज को सम्पात वाला करके गर्भिणी को छोड़ कर मध्य भाग में लावे और भात,

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