कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ८९ ॥१॥ साङ्ग्रामिकं वेदिविज्ञानम् ॥२॥ वेनस्तदिति पञ्चप- र्वेषुकुम्भकमण्डलुस्तम्भकाम्पीलशाखायुगेध्माक्षेषु पाण्यो- रेकविंशत्यां शर्करास्वीक्षते ॥३॥ कुम्भमहतेन परिवे- क्षीरौदन का अभिमंत्रण करके आसिंचन करे ॥ मन वचन से चिन्तन करे । भात पके या नहीं ? यदि यथा चिन्तित होवे—जैसे विचार से भात का पकना निश्चित है तो-तो जिस कार्य्य की सिद्धि जाननी है वह अवश्य होगा जानना ॥ इध्म का उपसमाधान कर अभिमंत्रण करके इच्छित कार्य्य की जिज्ञासा ( मनमें ) कर रज्जु को धर देवे—रज्जु यदि तीन गुण हो जावे तो सफलता होगी । इसी प्रकार दर्भ स्तम्ब को उक्त मंत्र से अभिमंत्रण कर मन से जिज्ञासा करे; तो यदि कुशों की संख्या सम या विषम होवे तो भाँति २ की प्रयोजन की सिद्धि होगी जाने । फिर पहिले दिन पाठा को अभिमंत्रण करके जिज्ञासा करे, यदि पत्रों पत्रों का संकोचन हो जावे तो प्रयोजन की सफलता समझनी ॥ १ ॥ संग्राम के पूर्व दिन वेदि बनाकर “अम्बयो यन्ति०” सूक्त से अभिमंत्रण करके मन में कार्य की सिद्धि की चिन्ता करे। यदि दूसरे दिन वेदि सम हो या विषम हो तो कार्य की सिद्धि जानो ॥ २ ॥ पांच गिरह वाला बांस के डंडे को मंत्र से अभिमंत्रण करके खड़ा कर दे । यदि अभिष्ट दिशा की ओर दण्ड गिर जावे तो सिद्धि जानो ॥ धनुष को टंकोर कर अभिमंत्रण कर जिज्ञासा करे तो—धनुष के बाण फेकने से सिद्धि जानना ॥ जल भरे घट में दूध डालकर अभिमंत्रण कर चिन्तन करे, बढ़ जाने से सिद्धि ॥ कमण्डलु में जल भर कर उसमें दूध डाल कर अभिमंत्रण करे-बढ़ जाने से सिद्धि जानो ॥ दर्भ स्तम्ब अभिमंत्रण कर जिज्ञासा करे सम विषम होने से सिद्धि ॥ काम्पील शाखा को शिर पर धारण कर अभिमंत्रण कर पूछे ( मनमें ) यदि इष्ट दिशा में गिर जावे तो सिद्धि ॥ गाड़ी के युग को अभिमंत्रण कर पूछे इष्ट दिशापतन से सिद्धि । धान्य को अभिमंत्रण कर चिन्ता करे-अग्नि में डाले—यदि प्रदक्षिण क्रम से जले तो सिद्धि ॥ दोनों हाथ की दो अङ्गुलियों को अभिमंत्रण कर चिन्ता करे, बिन जाने हुए पुरुष के हाथ में २१ शर्करा को अभिमंत्रण कर चिन्ता करे—यदि बढ़ जावे तो सिद्धि, यदि सम या विषम हो तो ठीक २ सिद्धि जानो ॥२-३॥ अब नष्ट द्रव्य १२