कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ९१ टमुन्मृजानः॥४॥ उत्साद्य बाह्यतोऽङ्गारकपाले शिग्रुशर्क- रा जुहोति ॥५॥ केराकाँवादधाति ॥६॥ वर्षपरोतः प्रति- लोमकर्षितस्त्रिः परिक्रम्य खदायामर्के क्षिप्रं संवपति ॥७॥ नमस्ते अस्तु यस्ते पृथु स्तनयित्नुरित्यशनियुक्तमपादाय ॥८॥ प्रथमस्य सोमदर्भकेशानीकुष्ठलाक्षामञ्जिष्ठीबद- रिहरिद्रं भूर्जशकलेन परिवेष्ट्य मन्थशिरस्युर्वरामध्ये निखनति ॥ ९ ॥ दधि नवेनाश्नात्या संहरणात् ॥ १० ॥ आशापालीयं तृतीयावर्जं दृंहणानि ॥ ११ ॥ भौमस्य सम्मुख हो सूक्त का जप करता हुआ पूर्ववत् उपस्थान करे । उल्मुक को ग्रहण कर सूर्य्य भगवान् के सम्मुख होकर पूर्ववत् उपस्थान करे । और लकुट ग्रहण करके पूर्ववत् उपस्थान करे ॥३॥ नंगा होकर ललाट को मर्द्दन करता हुआ पूर्ववत् उपस्थान करे ॥४॥ घर के छप्पर के ओलती उजार कर घर के बाहर कपाल में आग के अङ्गारों को धर कर शिग्रु- पत्रों की आहुति देवे या शर्करा की आहुति करे ॥५॥ पटेरक समिध और अकवौन की समिधाओं का आधान करे ॥६॥ वृष्टि के कारण अति पीड़ित होकर खदा खन कर इसकी तीन बार परिक्रमा करके खदा में अर्कवृक्ष को शीघ्रही संवपन करे । ( अर्क वृक्ष को निलुंचन कर सारे सूक्त का जप करे सूक्त के अन्त में डाले । तब धूलि से खदा को भर देवे ) वृष्टि निवारण समाप्त । और ॥७॥ “नमस्ते अस्तु०” सूक्त से अशनि ( वर्षा होते समय बिजुली, पत्थर, उल्का का पात होता है। इसे वृक्ष पर या भूमि पर पत्थर आदि पड़ा हो, या बिजुली से नष्ट काष्ठ में से ) युक्त मट्टी आदि को लेकर सोम, दर्भ, केश, कुष्ठ, लाक्षा, मंजीठ, बैर, हरिद्रा इनको भोजपत्र में लपेट कर उसके नीचे छिद्र करके अभिमं- त्रण कर सस्य ( खेत में ) गाड़ देवे । यह कर्म्म चैत्र में करे । इससे अशनि से रक्षा होती है ॥८॥९॥ दही, मक्खन और नया धान्य न खावे जब तक खेत से अन्न तय्यार होकर घर न आवे ॥१०॥ अतिवृष्टि, अनावृष्टि, कीड़े ( शलभा ), चूहा, शुक, स्वचक्र या परचक्र इन सात को “ईति” ( ईतयः ) कहते हैं । “आशान|माशापालेभ्यः०” इस सूक्त के तीसरे मंत्र को छोड़ कर दृंहण ( दृढीकरण ) कर्म कहे गये ॥११॥ और