कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 124, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ें९२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । दृतिकर्माणि॥१२॥पुरोडाशानङ्गोत्तरानन्तः स्रक्तिषु निद्- धाति ॥१३॥ उभयान् सम्पातवतः ॥१४॥ सभाभागधा- नेषु च ॥ १५ ॥ असंन्तापे ज्योतिरायतनस्यैकतोऽन्यं शयानो भौमं जपति ॥ १६॥ इयं वीरुदिति मधुघं खाद- न्नपराजितात्परिषदमाव्रजति ॥१७॥ नेच्छत्रुरिति पाटामूलं प्रतिप्राशितम् ॥१८॥ अन्वाह ॥१९॥ बध्नाति ॥२०॥ मालां सप्तपलाशीं धारयति ॥२१॥ ये भक्षयन्त इति परिषेकेक- भक्तमन्वीक्षमाणो भुङ्क्ते ॥२२॥ ब्रह्म जज्ञानमित्यध्या- ज्योतिरायतन का भौम सम्बन्ध होने से दृति कर्म कहे जाते हैं ॥१२॥ चार पुरोडाशों को घर के भीतर कोणों में एक २ कर पत्थर पर धरे और पुरोडाश एवं पत्थर को सम्पात वाला करके निखनन पूर्व की भाँति जानो । सभा और महाधन गृह के कोणों में सू० ११ से १६ सू० तक दृंहण और दृति कर्म कहे गये ॥१३॥१४॥१५॥ एकाग्नि के आयतन का असंताप युक्त देश में अन्य पुरुष पत्थर पर नीचा मुख हुआ भौम सूक्त का जप करे। और दूसरी ओर सोता हुआ भौम सूक्त का ही दूसरा जप करे ॥१६॥ और “इयं वीरुत्०” से जेठी मधु खाता हुआ जन समूह बगल में पर्य्यावर्त्त कर पश्चिम से आवे ॥१७॥ सभा जीतने का कर्म्म समाप्त हुआ । “नेच्छत्रुः०” को पश्चिम से जपता हुआ पाटामूल को प्राशित करता हुआ सभा में आवे ॥१८॥ पाटामूल को मुँह में डाल कर मंत्र जपे ॥१९॥ पाटामूल को बांधे ॥२०॥ पाटा के फूलों की माला को अभिमंत्रण करके धारण कर शिर पर धारण करे । पाटालासी सात पत्ते की माला बना कर पहिने ॥२१॥ अब वृष्टि निवारण भक्ष-भोजन कर्म्म को कहते हैं। “ये भक्षयन्तः०” सूक्त से भात (शाकादि) को अभिमंत्रण करके भात को देखता हुआ खावे ॥२२॥ यह कर्म्म समाप्त हुआ । “ब्रह्म जज्ञानम्०” सूक्त से प्रथम काण्डादि सहित सूक्त को या वेद को या अनुवाक या कल्प या ब्राह्मण इनको अध्ययन करने की इच्छा करे तब २ सूक्त का जप करके अध्ययन करे । कलह शमन समाप्त हुआ । विवाद में जय के लिये सूक्त का जप करे । “ब्रह्म जज्ञानम्०” सूक्त का जप करके मीमांसा, व्याकरणादि शास्त्र वाद को करे । तब