कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ९७ प्रसिञ्चन्व्रजति ॥६॥ पाणिना वेत्रेण वा प्रत्याहृत्योपरि निपद्यते ॥१०॥ अयं ते योनिरित्यरण्योरग्निं समारोप- यति ॥११॥ आत्मनि वा ॥१२॥ उपावरोह जातवेदः पुनर्देवो देवेभ्यो हव्यं वह प्रजानन् ॥ आनन्दिनो मोदमानाः सुवीरा इन्धीमहि त्वा शरदां शतानीत्युपावरोहयति ॥ १३ ॥ यां त्वा गन्धर्वो अखनद्वृषणस्ते खनितारो वृषा त्वमस्यो- षधे । वृषासि वृष्ण्यावति वृषणे त्वा खनामसीत्युच्छु- ष्मापरिव्याधावायसेन खनति ॥ १४ ॥ दुग्धे फाण्टाव- षिच्योपस्थ आधाय पिषति ॥ १५ ॥ मयूखे मुसले वा- सोनो यथासित इत्येकार्कसूत्रमार्कं बध्नाति ॥ १६ ॥ यावदङ्गीनमित्यसितस्कन्धमसितबालेन ॥ १७ ॥ आवृ- षायस्वेत्युभयमप्येति ॥१८॥४॥४०॥ धन्वान०” इन दो मंत्रों से मन्त्रोदक नहीं होता है। नदी प्रवाह में जल सिंचन करता हुआ जावे । नदी दूर गमन कर्म समाप्त हुआ ॥९॥ हाथ या वेत जल को मार कर उसके ऊपर जावे । “अयं ते योनिः०” आर- ण्य अग्नि को स्थापन करे या अपने शरीर ही में स्थापन करे ॥१०॥११॥ “उपावरोह जातवेदः०” इत्यादि से कार्य काल समीप आने पर उपाव- रोहण करे ॥१३॥ “यां त्वा गन्धर्वो०” इत्यादि से पुरुष के वीर्य्य को करने के लिये विधि को कहते हैं । कपिकच्छु के जड़ को औषधि की भाँति खन कर सुरवालक ओषधि की भाँति खनकर दूध में पका कर या गर्म करके उपविष्ट धेनु के बगल में धरकर दूध को अभिमंत्रण कर पिवे ॥१४॥१५॥ मयूख या मुसल पर बैठ कर “यां त्वा०” ऋचा से सुरवालक को दूध में काथ बना कर पीकर कीलक पर बैठे । कपि- कच्छु को मुसल पर बैठ कर पीवे । अब शिश्न को मोटा करने की प्रक्रिया को कहते हैं । “यथासित०” सूक्त से एक शाखावाले अर्क ( आक ) मणि को धर कर अभिमंत्रण करके अर्क सूत्रं से बान्धे । “यावदङ्गीनं०” इस ऋचा से काले मृग के चर्म मणि बनाकर काले बाल से बान्धे । “आवृषायस्व०” सूक्त से हरिण के स्कन्धचर्म का १३