कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्वजति ॥१॥ काशादिविधुवकवेतसान्निमिनोति ॥२॥ इदं व आपइति हिरण्यमपिदधाति ॥३॥ अयं वत्स.इती- षीकाञ्जिमण्डूकं नीललोहिताभ्यां सकक्षंबद्ध्वा ॥४॥ इहे- त्थमित्यवक्या प्रच्छादयति ॥५॥ यत्रेदमिति निनयति ॥६॥ मारुतं क्षीरौदनं मारुतश्रुतं मारुतैः परिस्तीर्य मारु- तेन स्रुवेण मारुतेनाज्येन वरुणाय त्रिर्जुहोति ॥७॥ उक्त- मुपमन्थनम् ॥८॥ दधिमन्थं बलिं हृत्वा सम्प्रोक्षणीभ्यां
को अपने अनुकूल करे—अर्थात् जिस ओर होकर चाहें उस ओर प्रवाह को बहा देवे—वह “यददः संप्रयतीति०” सूक्त से अभिमंत्रण कर पूरे जल से—इष्ट देश होकर जल को सिंचन करता जावे ॥१॥ काश को अभिमंत्रण कर खात में रोपे । दिन में बालपर्णी को अभिमंत्रण करके नदी प्रवाह में रोपण करावे । पाटरक को अभिमंत्रण करके नदी मार्ग में गाड़ देवे । वेतस शाखा को अभिमंत्रण करके नदी प्रवाह में गाड़ देवे ॥२॥ “इदं व आप०” सूक्त से नदी प्रवाह में सोने को स्थापित करे ॥३॥ “अयं वत्स०” से इषीकाञ्जि ( इषिका की सी रेखा जिसके ) को नीले और लाल सूत से उसके बगल में मण्डूक को बाँध कर “इहेत्थं” सूक्त से शिपाल (सेमार) से मण्डूक को ढाँक देवे ॥४॥५॥ और “यत्रेद्” से मण्डूक पर जल को निनयन करे ॥६॥ यह इच्छा हो कि नदी का प्रवाह पूर्व को न हो तो नव प्रकार के प्रवाह में यह कर्म करे । वरुण देवता के पाकयज्ञ विधान से आज्यभागान्त तक करके “यददः संप्रयच्छतीः० सूक्त से तीन प्रकार अलग २ करके आहुति देवे । तब उत्तर तंत्र करे । काला धान्य, काली गौ के घृत, वेतसकाष्ठ की इन्धन से क्षीरौदन पका करके वेतस पत्रों से स्तरण करे, वधूक पटेरक का स्तरण करे, या इस तन्त्र में सब ही कर्म मारुत करे । उदक प्रवाह में, उदक प्रवाह भय में, नदी भय में, ग्राम में, नगर में, जहाँ उदक या नदी भय हो वहाँ सब ही जगह वारुण होम करना चाहिये । वैतसस्रुव से मारुत आज्य से वरुण देवता के लिये तीन आहुतियाँ देवे ॥७॥ वैतस का उपमंथन । दही को मह कर उसीकी बलि उपहार देवे—प्रोक्षणी से सिंचन करता हुआ जावे ॥८॥ बलिहरण करे । इसके अनन्तर “अति