भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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१०० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । च नो मद्यश्च नोऽनडुद्ध्यस्त्वं प्रथमं मह्यमापो वैश्वानरो रश्मिभिरित्यभिवर्षणानवसेचनानाम् ॥१४॥ उत्तमेन वा- चस्पतिलिङ्गाभिरुद्यन्तमुपतिष्ठते ॥१५॥ स्नातोऽहतवस- नो निकृत्वाहतमाच्छादयति ॥१६॥ ददाति ॥ १७॥ यथा मां- समिति वननम् ॥ १८॥ वत्सं सन्धाव्य गोमूत्रेणावसिच्य त्रिः परिणीयोपचृतति ॥ १९ ॥ शिरःकर्णमभिमन्त्रयते ॥२०॥वातरंहा इति स्नातेऽश्वे सम्पातानभ्यतिनयति॥२१॥ पलाश चूर्णैषूत्तरान् ॥२२॥ आचमयति ॥२३॥ आप्लावयति ॥२४॥ चूर्णैरेव किरति ॥२५॥ त्रिरेकया चेति ॥२६॥५॥४१॥ भद्रादधीति प्रवत्स्यन्नुपदधीत ॥१॥ जपति ॥२॥ अभिमंत्रण करके तब आप्लुवन करे और अवसेचन करे ॥ विघ्नशमन काम अभिवर्षण और अवसेचन कर्म्म समाप्त हुए ॥ १४ ॥ “वैश्वानरो रश्मिभिः” इस सूक्त के “उद्देहि वाजिनं” बीस ऋचाओं से स्नान कर उगते हुए सूर्य का उपस्थान करे ( अर्थ उत्थापन कामनावाला ) ॥ १५ ॥ स्नान कर अखण्ड नये वस्त्र पहन कर नये वस्त्र को लाकर ढाक देवे और वस्त्र को देवे ॥ विद्रावणादि विषय में शान्ति करने वाला पुरुष उक्त कर्म करे ॥ विघ्नशमन कर्म समाप्त हुए ॥१६॥ १७॥ “यथामांसम्०” सूक्त से गो वत्स के मिलाप का कर्म करे ॥१८॥ बछरे को गौ के पास बान्धे और गोमूत्र से उसे अवसेचन करे । तीन बार भ्रमण कराके जल पीने को छोड़ देवे ॥ १९ ॥ एवं गौ के शिर और कानों को अभिमंत्रण करे ॥२०॥ अब अश्वशान्ति विधि को कहेंगे । घोड़े को नहाने पर “वातरंहा” मंत्र से उसपर जल गिरावे ॥२१॥ पलाश के पत्तों का चूर्ण करके जलमें मिलाकर घोड़े पर उसे ढाक देवे ॥२२॥ और घोड़े के मुख के भीतर जल देकर आचमन करावे ॥२३॥ उक्त चूर्णों को घोड़े पर छिड़के, तीन ऋ० एक और दश ऋ० से ॥२४॥ २५॥२६॥५॥४१॥ अश्वशान्ति से घोड़े तेजस्वि, निरुपद्रव, शीघ्रगामी और आरोग्य होते हैं ॥ यह एकतालिसवी कण्डिका समाप्त हुई ॥४१॥ प्रवास में धनोपार्जनार्थ जाने में चोरभय, जलभय, मार्गमें भय,