कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १०१ यानं सम्प्रोक्ष्य विमोचयति ॥३॥ द्रव्यं सम्पातवदुत्थापयति ॥४॥ निर्मृज्योपयच्छति ॥५॥ उभा जिग्यथुरित्यार्द्रेपा- दाभ्यां सांमनस्यम् ॥६॥ यानेन प्रत्यञ्चौ ग्रामान्प्रति- पाय प्रयच्छति ॥७॥ आयातस् समिध आदायोर्जं बि- भ्रदित्यसङ्कल्पयन्नेत्य सकृदादधाति ॥८॥ ऋचं सामेत्य- नुप्रवचनीयस्य जुहोति ॥९॥ युक्ताभ्यां तृतीयाम् ॥१०॥ आनुमतीं चतुर्थीम् ॥११॥ समावर्तनीयसमापनीययो- इत्यादि न हों इस लिये तत्सम्बन्धि कर्मको कहेंगे ॥ “भद्राद्दधि०” से प्रवास में जाने वाला जो अर्थ की चेष्टा करना चाहता है—आहु- तियाँ देवे या मंत्रों का जप करे ॥२॥ जिस सवारी पर जावे उसका सम्प्रोक्षण करके सवारी से उतरे और घोड़े आदि को उससे छुड़ा देवे ॥३॥ वाणिज, द्रव्य, वस्त्र, घोड़ा आदि सब ही वस्तु जब बेचने को ले जावे तो यह कर्म करे ॥४॥ कीने हुए द्रव्य को भली भाँति बुझ कर लेवे ॥५॥ “उभा जिग्यथुः” इत्यादि से आगत पुरुष की प्रसन्नता, मित्र बनाने के लिये समयोचित सत्कार, हाथ, पैर धोने को जल, खाने की वस्तु, आसनादि से सत्कार करे । प्रत्येक पदार्थ के देने में उक्त मंत्र का जप कर लेवे ॥६॥ हाथी आदि सवारी को मंगाकर अभिमंत्रण करके उस सवारी पर सब ही आगतशिष्ट पुरुषों को बैठावे और आप चढ़लेवे और ग्राम से पश्चिम दिशा की ओर जावे और फिर वहाँ से वापस आवें । इसके पश्चात् भात को अभिमंत्रण करके उनके साथ ही भोजन करे या मन्थ पीवें ॥ सांमनस्य समाप्त हुआ । युद्ध में एक साथ लड़ने के लिये प्रवृत्त होने में सहागत के कर्म हुए और अन्य का साधारण हुआ ॥ पहिले पैरों को पखाड़ कर तब कर्म करे ॥७॥ यदि घर में परस्पर विरोध हो तो सांमनस्य कर्म करे । उसकी विधि-कर्त्ता वन में जाकर समिधाओं को लेकर तूष्णीं घर पर आकर “उर्जं बिभ्रत्०” इस आधी ऋचा से ( संकल्प न करके ) किसी घर या साधारण देश में एक वार आधान करे ॥८॥ वेदज्ञ का कर्म “ऋचं साम०” इत्यादि दो ऋ० से प्रत्येक ऋचा से आज्य की आहुति देवे ॥९॥ दोनों ऋ० से तीसरी आहुति करे । अनुमतये स्वाहा से चौथी आहुति करे ॥१०॥११॥ साधारण