कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १०५ ये अग्नय इति क्रव्यादादुपहत इति पालाशं बध्नाति ॥१६॥ जुहोति ॥१७॥ आदधाति ॥१८॥ उदञ्चनेनोदपात्र्यां यवानङ्गिारानीयोल्लोपम् ॥१९॥ ये अग्नय इति पाला- श्या दर्व्या मन्थमुपमथ्य काम्पीलीभ्यामुपमन्थनीभ्याम् ॥२०॥ शमनञ्च ॥२१॥७॥४३॥ य आत्मदा इति वशाशमनम् ॥ १ ॥ पुरस्तादग्नेः प्रतीचीं धारयन्ति ॥२॥ पश्चादग्नेः प्राङ्मुख उपविश्यान्वा- रब्धायै शान्त्युदकं करोति ॥ ३ ॥ तत्रैतत्सूक्तमनुयोजय- ति ॥ ४ ॥ तेनैनामाचामयति च सम्प्रोक्षति च ॥ ५ ॥ अन्न ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥ १४ ॥ और बूढ़ी स्त्रियां गीत मङ्गल्यादि करें, ब्राह्मण गण पुण्याह वाचन करे ॥ जहां घर, मण्डप या कुटी आदि हो चाहे पत्थर, ईंट, मट्टी, टट्टी, काष्ठ अदि के क्यों न हों सब ही दशा में इसी विधि से वास्तु याग करना चाहिये ॥१५॥ “ये अग्नय०” “क्रव्यादादुपहत०” इत्यादि ७ ऋचासे पालाश मणि को बान्धे । और आज्य की आहुति देवे ॥१७॥ और यहीं आधान करे ॥१८॥ उत्तर से जलपात्र में यवों को डाल कर लाकर आलो पात्री से यव की आहु- ति देवे ॥ १९ ॥ “ये अग्नय०” से पलाशी दर्वी से मन्थको काम्पीली की दो मन्थनियों से मथकर ॥ वशा (जो गौ गर्भ धारण नहीं करती) शमन विधान को कहते हैं ॥ “ये अग्नय०” इन १० ऋचाओं से वशा को अभिमंत्रण करके तब ब्राह्मण को देवे ॥ जिस घर में वशा रहती है वह गृह दैवहत होता है ॥२१॥७॥४३॥ यह तेतालीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥ “य आत्मदा०” से वशाशमन कर्म करे जिससे तज्जन्य दोष दूर होवे ॥ १ ॥ अग्नि के पूर्व भाग में वशा को पश्चिम मुँह कर खड़ी रक्खे ॥ और अग्नि के पश्चिमभाग में पूर्वमुख बैठकर अन्वा- रब्धा वशाके लिये शान्ति उदक को करे ॥ ३ ॥ उस शान्ति उदक में “य आत्मदा०” सूक्त का अनुयोग करे ॥४॥ उस शान्ति उदक से ( मातली–अन्त. से ) आचमन करावे एवं प्रोक्षण करे ॥ ५ ॥ १४